श्रीरामकथा के सातवें दिन वनगमन यात्रा और राजा दशरथ के महाप्रयाण का मार्मिक वर्णन
हनुमान चालीसा के पाठ से मिलता है भक्ति और विश्वास का बल
भक्ति के नाम पर अश्लीलता परोसना अनुचित
श्रीरामकथा के सातवें दिन प्रमुख देवस्थानों के महंतों और धर्माचार्यों का हुआ सम्मान
जौनपुर। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता ज्ञान प्रकाश सिंह द्वारा आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के सातवें दिन कथाव्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम की वनगमन यात्रा, केवट प्रसंग, गुरु के मार्गदर्शन की महत्ता तथा राजा दशरथ के महाप्रयाण सहित रामायण के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची भक्ति है। मनुष्य के जीवन में श्रद्धा, धैर्य, त्याग, समर्पण और मर्यादा का विशेष महत्व है। जो व्यक्ति प्रभु पर अटूट विश्वास रखता है और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोता, वह जीवन रूपी भवसागर से अवश्य पार हो सकता है।
आचार्य शांतनु महाराज ने केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि रामराज्य की स्थापना की भावना को सबसे पहले समझने और अपने आचरण में उतारने वालों में केवट का स्थान विशेष है। केवट ने भगवान श्रीराम को गंगा पार कराने के बाद उनसे किसी प्रकार की उतराई या पारिश्रमिक लेने से इनकार कर दिया। उसके लिए प्रभु के दर्शन और उनकी सेवा का अवसर ही सबसे बड़ा धन था। केवट की भक्ति यह संदेश देती है कि सच्चे भक्त के लिए भगवान से सांसारिक वस्तुएं प्राप्त करना नहीं, बल्कि उनके प्रति प्रेम और समर्पण रखना सर्वोपरि होता है।
उन्होंने कहा कि जब भक्त भगवान से किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं रखता और निस्वार्थ भाव से उनकी सेवा करता है, तब भगवान भी अपने भक्त के प्रेम के ऋणी हो जाते हैं। भगवान श्रीराम और हनुमान जी का संबंध इसका अनुपम उदाहरण है। हनुमान जी ने अपना संपूर्ण जीवन प्रभु श्रीराम की सेवा में समर्पित कर दिया। भगवान श्रीराम के बार-बार आग्रह के बाद भी हनुमान जी ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उनकी एकमात्र इच्छा प्रभु के चरणों की सेवा करना थी। आचार्य ने कहा कि भक्त को भगवान से धन, वैभव और प्रतिष्ठा के बजाय सेवा, भक्ति और सद्बुद्धि की कामना करनी चाहिए।
आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि कलियुग में हनुमान जी को सिद्ध देवता के रूप में पूजा जाता है। संकटों से मुक्ति, मन की शांति और आत्मबल के लिए श्रद्धालुओं को नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हनुमान जी का जीवन प्रभु के प्रति निष्ठा, समर्पण, साहस और सेवाभाव की प्रेरणा देता है। उनकी भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना भी भक्ति का महत्वपूर्ण स्वरूप है। केवट की प्रतीक्षा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति के मार्ग में धैर्य का विशेष महत्व है। केवट की कथा से यह शिक्षा मिलती है कि प्रभु के प्रति विश्वास बनाए रखने वाले व्यक्ति को प्रतीक्षा का फल अवश्य मिलता है। जीवन में कई बार मनुष्य को अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है, लेकिन इस दौरान विश्वास और धैर्य नहीं खोना चाहिए। उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्तों के भाव को समझते हैं और समय आने पर उन्हें उचित फल प्रदान करते हैं। सच्ची श्रद्धा मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
वनगमन यात्रा का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य शांतनु महाराज ने बताया कि भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी प्रयागराज पहुंचे, जहां उनकी भेंट महर्षि भारद्वाज से हुई। भगवान श्रीराम सर्वज्ञ होने के बावजूद महर्षि भारद्वाज से वन जाने का उचित मार्ग पूछते हैं। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि जीवन में सही रास्ता चुनने के लिए गुरु और मार्गदर्शक का होना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का आचरण मनुष्य को विनम्रता और गुरु के प्रति सम्मान की सीख देता है। ज्ञान और सामर्थ्य होने के बावजूद मार्गदर्शन प्राप्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए। जिस व्यक्ति के जीवन में कोई मार्गदर्शक नहीं होता, उसके भटकने की आशंका बनी रहती है। गुरु मनुष्य को सही और गलत के बीच अंतर समझाते हैं तथा कठिन परिस्थितियों में उचित निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं। इसलिए जीवन में माता-पिता, गुरु और अनुभवी लोगों के मार्गदर्शन का सम्मान करना चाहिए।
आचार्य शांतनु महाराज ने भगवान श्रीराम के वनगमन के प्रसंग को विस्तार से समझाते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम ने पिता की आज्ञा और रघुकुल की मर्यादा की रक्षा के लिए राजमहल के सुखों का त्याग कर दिया। उनके लिए राजसिंहासन, वैभव और व्यक्तिगत सुख से बढ़कर पिता का वचन तथा परिवार की प्रतिष्ठा थी। उन्होंने किसी प्रकार का विरोध किए बिना वनवास स्वीकार किया और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में आदर्श स्थापित किया। उन्होंने कहा कि यदि माता कैकेयी के कारण भगवान श्रीराम को वनवास नहीं मिला होता, तो उनके त्याग, धैर्य और मर्यादा के अनेक अनुपम प्रसंग सामने नहीं आते। वनवास की परिस्थितियों ने प्रभु श्रीराम के आदर्श चरित्र को और अधिक उजागर किया। इस प्रसंग का तात्पर्य किसी के दुख या अपयश को उचित ठहराना नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा लेना है। मनुष्य के जीवन में कठिनाइयां कई बार उसके व्यक्तित्व को निखारने और उसके वास्तविक गुणों को सामने लाने का माध्यम बनती हैं।
माता सीता और लक्ष्मण जी के वनगमन का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि इन दोनों का निर्णय प्रेम, त्याग और समर्पण की अनुपम मिसाल है। माता सीता ने पति के साथ वन जाने का निर्णय लेकर दांपत्य जीवन की निष्ठा और सहभागिता का आदर्श प्रस्तुत किया, जबकि लक्ष्मण जी ने भाई की सेवा और सुरक्षा के लिए राजमहल के सुखों का त्याग कर दिया। उनके जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि परिवार के प्रति प्रेम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के निर्वहन और कठिन समय में साथ खड़े रहने से प्रकट होता है। श्रीराम के वनवास और उनसे वियोग के कारण राजा दशरथ की व्यथा का वर्णन करते हुए आचार्य शांतनु महाराज भावुक हो उठे। कथा के इस प्रसंग ने पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को भी भावविभोर कर दिया। भगवान श्रीराम से अत्यधिक स्नेह रखने वाले राजा दशरथ अपने पुत्र के वियोग को सहन नहीं कर सके। उनके महाप्रयाण का प्रसंग सुनकर कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
आचार्य ने कहा कि माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति प्रेम अत्यंत गहरा होता है। परिवार में संबंधों का महत्व, माता-पिता के प्रति सम्मान और उनके भावों को समझना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। भगवान श्रीराम ने पिता के वचन का पालन कर यह सिद्ध किया कि परिवार की मर्यादा और कर्तव्य का निर्वहन व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर होना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने परिवार में बच्चों को अच्छे संस्कार दें, बुजुर्गों का सम्मान करें और रिश्तों में प्रेम, विश्वास तथा जिम्मेदारी को प्राथमिकता दें। कथा के दौरान आचार्य शांतनु महाराज ने धार्मिक आयोजनों में भक्ति के स्वरूप पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भक्ति के नाम पर अश्लीलता परोसना गलत है। भक्ति में नृत्य और संगीत के माध्यम से आनंद की अभिव्यक्ति अलग बात है, लेकिन धार्मिक कार्यक्रमों में अश्लीलता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भक्ति का उद्देश्य मन को पवित्र करना, ईश्वर के प्रति श्रद्धा बढ़ाना और समाज में सदाचार की भावना विकसित करना है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से अपील की कि धार्मिक आयोजनों की गरिमा और पवित्रता बनाए रखें। भजन, कीर्तन, कथा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां ऐसी होनी चाहिए, जो लोगों को आध्यात्मिकता से जोड़ें तथा नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के प्रति प्रेरित करें। सनातन परंपरा में भक्ति के साथ मर्यादा, संयम और सदाचार का विशेष महत्व है। धार्मिक मंचों से समाज को सकारात्मक संदेश देने की जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। श्रीरामकथा के सातवें दिन का विशेष आकर्षण जनपद के प्रमुख देवस्थानों के महंतों, पीठाधीश्वरों, पुरोहितों और धर्माचार्यों का मंच से सम्मान रहा। मुख्य आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह ने संत-महात्माओं और धर्माचार्यों का सम्मान कर जनपद की धार्मिक परंपराओं तथा सनातन संस्कृति के प्रति आदर व्यक्त किया। इस दौरान धार्मिक परंपराओं के संरक्षण, आध्यात्मिक चेतना के प्रसार और समाज में संस्कारों के महत्व को लेकर भी वातावरण भक्तिमय बना रहा।
आयोजन स्थल पर भव्य पंडाल और श्रद्धालुओं के लिए की गई व्यवस्थाओं के बीच आचार्य शांतनु जी महाराज की अमृतमयी वाणी से पूरा वातावरण राममय हो उठा। कथा के विभिन्न प्रसंगों के दौरान श्रद्धालु एकाग्र होकर भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़ी शिक्षाओं को सुनते रहे। केवट की निस्वार्थ भक्ति, हनुमान जी का समर्पण, गुरु के मार्गदर्शन की महत्ता, माता-पिता के प्रति कर्तव्य और परिवार के संस्कारों जैसे विषयों ने कथा को आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक संदेश से भी जोड़ा। इस अवसर पर अंगराज जी (मा. प्रान्त संघचालक), कुंवर बृजेश सिंह (राज्यमंत्री, लोक निर्माण विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार), प्रो. बिहारी लाल शर्मा (कुलपति, सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय), राकेश सिंह (विधायक, गौरीगंज, अमेठी), डॉ. सुजीत सिंह (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष), रजत जी (जिला प्रचारक, मीरजापुर), डॉ. उमेश चन्द्र तिवारी, विनय शाही जी, श्रीमती कमला सिंह, आचार्य रजनीकांत द्विवेदी, डॉ. सत्यप्रकाश सिंह, डॉ. समर बहादुर सिंह, डॉ. अरुण मिश्रा, निखिलेश सिंह, सतीश सिंह ‘गुड्डू’, भूपेश कुमार सिंह, विमल कुमार गौतम, शैलेश कुमार सिंह, जितेंद्र कुमार मिश्रा, नरेंद्र विश्वकर्मा, बटेश्वर सिंह, के.के. विश्वकर्मा, अमित सिंह, जज सिंह ‘अन्ना’, राम सिंह राव, श्री महंत नरसिंह दास जी महाराज, महंत बाबा रामदास जी महाराज, मुक्तेश्वर पंडा, महंत राजन दास जी, रमेश मिश्रा, पं. रविन्द्र द्विवेदी जी एवं पीठाधीश्वर महंत रामदास जी महाराज सहित जनपद के विभिन्न मंदिरों के महंत, पुरोहित, संत-महात्मा और अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।





