प्रियंका गांधी को द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर में निगेटिव नहीं दिखाया है: आहना कुमरा



Jaunpur Live News Network
जौनपुर लाइव न्यूज नेटवर्क
आहना कुमरा विवादास्पद फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का में बोल्ड रोल करने के बाद से सुर्खियों में हैं। अब वह चर्चा में हैं नई फिल्म द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर को लेकर जिसमें वह प्रियंका गांधी की भूमिका में हैं। वह विवाद, बोल्डनेस और अपनी मां के बारे में दिल खोलकर बातें कर रही हैं।
द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर में प्रियंका गांधी के रोल में आपका लुक बहुत पसंद किया जा रहा है?
मैंने इनसाइड एज नामक एक शो किया था, जिसमें मेरा रोल बहुत छोटा-सा था, मगर निर्देशक हंसल मेहता ने उस रोल की तारीफ करते हुए एक ट्वीट किया था। उसके बाद मुझे एक कास्टिंग डायरेक्टर का फोन आया और उन्होंने मुझे द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के एक रोल के लिए बुलाया था। उस वक्त तक मुझे पता नहीं था कि मैं प्रियंका की तरह लग सकती हूं या नहीं? मैंने उनके एक-दो इंटरव्यू देखे। मैं जब ऑडिशन पर पहुंची, तो मुझे एक साड़ी दी गई और एक हेडगियर दिया। वह पहनकर जब मैं बाहर निकली और मैंने खुद को आईने में देखा, तो मैं हैरान रह गई। मैं अपने ट्रांसफॉर्मेशन पर हैरान थी। ऑडिशन में मुझे प्रियंका गांधी का वही इंटरव्यू देने को कहा गया, जो मैं घर से देखकर गई थी। मुझे उनकी टोन पता थी। मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ ऑडिशन दिया। दो हफ्ते बाद जब मुझे फोन आया कि मैं इस रोल के लिए चुन ली गई हूं।
इस फिल्म को कांग्रेस के खिलाफ माना जा रहा है? आपकी पॉलिटिकल आइडियॉलजी क्या है?
मेरी मां पुलिस में हैं। मैंने देखा है कि वह सिनेमा हॉल में जन मन गण सुनकर रो पड़ती हैं। पॉलिटिकल पार्टीज की आइडियॉलजी बहुत अलग होती हैं। उनके लिए वोट बैंक सबसे ज्यादा जरूरी होता है। मेरी मां के लिए इंसाफ अहमियत रखता है । वह अपने करियर में लगातार लोगों की मदद करती आई हैं, तो मेरी आइडियॉलजी अलग है। मैं कभी किसी पॉलिटिकल पार्टी का पक्ष नहीं ले सकती, असल में मुझे इनके मुद्दे ही समझ में नहीं आते। ये तो एक-दूसरे पर उंगली उठाकर गाली-गलौज करते रहते हैं। फिलहाल मैं अपने काम पर फोकस कर रही हूं। मेरे माता-पिता ने मुझपर अपने विचार थोपने की कोशिश कभी नहीं की, मैं अपने विचारों खुद तक सीमित रखना चाहती हूं। फिलहाल मैंने एक ऐसा रोल प्ले किया है, जिसे मैं बहुत अडमायर करती हूं। मैं प्रियंका गांधी से कभी मिली नहीं हूं, मगर मिलने की दिली ख्वाहिश है। मैंने उनको अपनी बेस्ट नॉलेज में अपने निर्देशक की जानकारी और उनकी अंडरस्टैंडिंग के साथ निभाने की कोशिश की है।
किरदार को करते हुए आपको ऐसा लगा कि प्रियंका गांधी को निगेटिव अंदाज में दर्शाया जा रहा है?
मैं उन्हें जहां तक समझ पाई, तो वह बेहद शांत पॉलिटिशन हैं। राजनीति से जुड़े दूसरे लोग हो-हल्ला करते हैं, मगर वह हमेशा संयत रहती हैं। उनको न चाहते हुए भी बहुत अटेंशन मिला है। मुझे याद है, उनके एक इंटरव्यू में बरखा दत्त ने उनसे 10 बार पूछा था कि वह पॉलिटिक्स में क्यों नहीं आना चाहतीं, तो उन्होंने कहा था कि वह अपने परिवार के साथ खुश हैं। वह नामी पॉलिटिकल परिवार से ताल्लुक रखती हैं, तो उनसे कई अपेक्षाएं हैं। मैं यह जरूर कह सकती हूं कि उन्हें फिल्म में बहुत ही सकारात्मक अंदाज में दर्शाया जा रहा है।
अनुपम खेर और अक्षय खन्ना के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
सच तो यह है कि अक्षय सर के साथ पहली बार काम करते हुए मैं नर्वस थी। जिस दिन सेट पर मेरा पहला शॉट था, वह मौजूद थे और मुझे देख रहे थे। मैं और नर्वस हो गई, तब मेरे निर्देशक ने मुझे शांत किया। मैंने शॉट दिया, जो उन्हें बहुत अच्छा लगा। उन्हें फिल्म में मेरा लुक बहुत पसंद आया। अनुपम सर के साथ यह मेरी दूसरी फिल्म है। पहली फिल्म है ले ले मेरी जान, जो अभी तक प्रदर्शित नहीं हुई है। वह बेहद प्रोत्साहित करने वाले साथी कलाकार हैं।
फिल्म ट्रेलर लॉन्च के बाद से ही विवादों में रही है। क्या कहना चाहेंगी?
मैं यही कहूंगी कि आप फिल्म को एक चांस दीजिए। विवाद लिपस्टिक अंडर माय बुर्का के समय में भी हुए थे, उस वक्त भी हमने यही कहा था कि फिल्म को मौका दीजिए। बिना देखे आप कौन होते हैं, यह कहने वाले कि फिल्म मत रिलीज कीजिए। फिल्म देखकर ही आप फिल्म को लेकर अपनी धारणा बना सकते हैं। आप ही देखिए लिपस्टिक की रिलीज के बाद यह फिल्म लोगों को बहुत पसंद आई।
आपने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत लिपस्टिक अंडर माय बुर्का से बहुत ही बोल्ड अंदाज में की थी, क्या इस फिल्म के बाद आपकी इमेज ट्रांसफॉर्म होगी?


सच कहूं तो मुझे यह जो बोल्ड टैग है, न, यह बहुत ज्यादा पसंद है। पहले मुझे इससे बहुत आपत्ति थी, अब लगता है यह नकारात्मक नहीं बल्कि बहुत ही पॉजिटिव टैग है। आम तौर पर मुझ जैसे न्यूकमर्स को अच्छे रोल्स मिलते नहीं हैं, मगर मैं बहुत ही लकी हूं कि मुझे दमदार भूमिकाएं मिलीं। मैंने बच्चन साहब और नसीर साहब के साथ काम किया है। वे लोग इतनी लंबी पारी इसलिए खेल पाए, क्योंकि उन्होंने हमेशा अपने काम पर फोकस किया।
अभिनेत्रियां इंटिमेट सीन करते हुए बिंदास होती हैं, तो उन्हें बोल्ड माना जाता है। आपके लिए क्या परिभाषा है?
(हंसते हुए) मेरे साथ तो एक बहुत ही दिलचस्प बात हुई है। जब इस तरह के दृश्य शूट होते हैं, तो ओके होने के बाद स्टाइलिस्ट फौरन आकर मुझे तौलिये से लपेट देती, मगर बेचारे ऐक्टर को कोई पूछता ही नहीं है कि उसे कैसा लग रहा होगा? मैंने एक शॉर्ट फिल्म की, जिसमें कई इंटिमेट सीन थे। शॉट खत्म होते ही मुझपर तौलिया लपेट दिया गया, मगर उनपर किसी ने ध्यान नहीं दिया। तब वह बड़ी बेचारगी से बोले, अरे भाई मुझे भी कोई पूछो। मुझे भी शर्म आती है। वह ऐक्टर थे चंदन रॉय सान्याल। हमको लगता है कि सिर्फ लड़कियां बोल्ड हो सकती हैं। यह आम धारणा है कि ऐसे दृश्यों में लड़कों को तो मजा ही आ रहा होगा। जबकि ऐसा जरूरी नहीं है। अपने कई को-ऐक्टर्स को मैंने किसिंग या इंटिमेट सीन्स से पहले नर्वस होते हुए देखा है। मेरे लिए बोल्डनेस वह है कि आप अपने फैसले खुद ले सकें और अपने फैसलों पर नाज कर सकें।
आपकी वेब सीरीज रंगबाज को दर्शकों को अच्छी प्रतिक्रिया मिली?
हां, लोगों को मेरा काम बहुत पसंद आया। मैंने देखा है कि पोस्टर में ज्यादातर हीरोज की ही तस्वीरें होती हैं, हीरोइनों को पोस्टर पर कम महत्व दिया जाता है, लेकिन पहली जनवरी को मेरा पोस्टर हर जगह। मुझे खुशी हुई क्योंकि आज जितने बड़े पोस्टर्स फिल्मों के लगते हैं, उतने ही बड़े होर्डिंग्ज वेब सीरीज के लगने लगे हैं।
आप पर अपनी पुलिस वाली मम्मी का कितना प्रभाव है?
बहुत ज्यादा। मेरे पापा मॉस्को में रहते थे। साल में एक बार इंडिया आते थे। मैं तो मम्मी के साथ थाने में पली-बढ़ी हूं। मेरी मम्मी थाने की इंचार्ज थीं, तो मेरा होमवर्क भी थाने में ही होता था। मेरी मां का वक्त थाने में बीतता था। मेरी मां हमारे लिए खाना नहीं बनाती थीं, उनके पास समय नहीं था। कई बार मैं सोचती थी कि मेरी मम्मी ऐसे किसी को मार कैसे देती हैं? असल में वह गुंडों की बड़ी दुर्गत करती थीं। बाकी मम्मियां ऐसी नहीं होतीं। अब लगता है कि थैंक गॉड मेरी मां सबसे अलग रहीं।



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