संविधान बेंच तय करेगी स्कूलों में संस्कृत में प्रार्थना हो या नहीं



नई दिल्ली। केंद्रीय विद्यालयों की तरह स्कूलों में असतो मा सद्गमय जैसी धार्मिक प्रार्थनाएं गाई जा सकती हैं या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ फैसला करेगी। खुद को नास्तिक कहने वाले विनायक शाह की ओर से दायर जनहित याचिका में देश भर में केंद्र सरकार के प्रशासन वाले स्कूलों में इसे प्रार्थना के तौर पर शुरू करने की सरकारी नीति को चुनौती दी गई थी।
शाह ने दावा किया था कि केंद्रीय विद्यालय संगठन की ओर से 28 दिसंबर, 2012 को जारी संशोधित एजुकेशन कोड में सभी छात्रों के लिए सुबह की प्रार्थना में इसे गाना अनिवार्य बनाया गया था। इससे नास्तिक विचारधारा रखने वाले लोगों को परेशानी हुई है। उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन देने के बावजूद इस चलन को बंद नहीं किया गया है। 
शाह ने दलील दी थी कि स्कूलों में सुबह की प्रार्थना के दौरान धार्मिक स्तुतियां और प्रार्थना गाना संविधान के आर्टिकल 28 के तहत निषेध है। यह आर्टिकल सरकारी स्कूलों और सरकार से अनुदान प्राप्त करने वाले स्कूलों में किसी धार्मिक निर्देश पर विशेष रोक लगाता है। यह धर्मनिरपेक्षता का एक अनिवार्य हिस्सा है। शाह की ओर से सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंजाल्विस कोर्ट में दलीलें दे रहे हैं। उनकी दलील थी कि संविधान के तहत प्रत्येक व्यक्ति को एक मूलभूत अधिकार के तौर पर अपने तरीके से प्रार्थना करने की अनुमति या कोई प्रार्थना न करने की अनुमति है। शाह ने कहा कि स्कूलों में कुछ भी अनिवार्य तौर पर शुरू नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि संस्कृत श्लोक असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय... कोई धार्मिक उपदेश नहीं है बल्कि ये यूनिवर्सल सत्य है। इसे सभी धर्म और मान्यताओं में माना जाता है। क्रिश्चन स्कूलों में ईमानदारी को सर्वोपरि नीति बताया जाता है तो क्या इसे भी धार्मिक मसला कहा जाएगा? इस पर जस्टिस नरीमन ने कहा कि लेकिन यह श्लोक तो उपनिषद से लिया गया है। तब सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आधिकारिक लोगो (चिह्न) भी तो भगवद् गीता से लिया गया है। कोर्ट में जज जहां बैठते हैं, उनके ठीक पीछे ...यतो धर्मस्य ततो जय लिखा हुआ है यानी जहां धर्म है, वहां विजय है। इसमें कुछ भी धार्मिक और सांप्रदायिक नहीं है। लेकिन जस्टिस नरीमन ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट हैं कि मामला संविधान बेंच को रेफर किया जाए। जस्टिस नरीमन ने इस मामले को एक उपयुक्त बेंच के सामने सुनवाई के लिए रखने के उद्देश्य से देश के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के पास भेज दिया।


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