हिम्मत बहादुर सिंह
वाराणसी। उत्तर प्रदेश विधान परिषद की स्नातक एवं शिक्षक खंड निर्वाचन के लिए नामांकन की अंतिम तिथि समाप्त होने के साथ ही चुनावी सरगर्मियां बढ़ गयी हैं। वैसे तो स्नातक खंड निर्वाचन में राजनीतिक दल पहले से ही प्रत्याशी लड़ाते रहे हैं लेकिन इस बार शिक्षक निर्वाचन खंड में भी राजनीतिक दलों द्वारा जोर आजमाईश की जा रही है।
वहीं दूसरी ओर दो बड़े शिक्षक संगठनों के रिटायर हो चुके अध्यक्षों की भी प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। इसका मुख्य कारण 2002 का एक शासनादेश हैं जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि सरकार, मान्यता प्राप्त संघों के ऐसे किसी भी अध्यक्ष से कोई वार्ता नहीं करेगी जो सेवा से रिटायर हो चुके होंगे। इतना ही नहीं संगठनों को यह भी निर्देश है कि वे यथाशीघ्र अपना चुनाव कराते हुए किसी सेवारत को अध्यक्ष चुने लेकिन विधान परिषद का सदस्य होने के नाते ही इन रिटायर हो चुके माननीयों को सरकार से वार्ता करने का अवसर मिल जाता था, इसलिए ये माननीय किसी सेवारत को अध्यक्ष बनने ही नहीं दिए। अबकी बार चुनावी बयार देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकार का फायदा होने जा रहा है और अब वह इन रिटायर हो चुके अध्यक्षों से वार्ता नहीं करने में कामयाब हो जाएगी।
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