जौनपुर। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के साइबर क्लब के नोडल अधिकारी डॉ. दिग्विजय सिंह राठौर ने कहा कि वर्ष 2026 साइबर सुरक्षा की दृष्टि से एक ऐतिहासिक और चुनौतीपूर्ण वर्ष साबित होने वाला है। नए साल में साइबर अपराधियों से प्रभावी ढंग से लड़ने के लिए आमजन को मानसिक और तकनीकी रूप से तैयार होना होगा। साइबर दुनिया में 'जीरो ट्रस्ट मॉडल' अपनाए बिना अब सुरक्षा संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि आभासी दुनिया में किसी भी व्यक्ति, कॉल, लिंक या संदेश पर बिना सत्यापन के विश्वास करना सबसे बड़ी भूल है। जब तक लोग डिजिटल संदेशों पर अंधविश्वास करना बंद नहीं करेंगे, तब तक साइबर अपराधों से पूरी तरह बचाव संभव नहीं है।
उन्होंने बताया कि साइबर अपराधी डर और विश्वास इन दो भावनाओं को हथियार बनाकर लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। 'साइबर अरेस्ट' जैसे नए-नए तरीक़े इसका जीवंत उदाहरण हैं जिनके माध्यम से लोग भय के कारण तुरंत अपराधियों के जाल में फँस जाते हैं। उन्होंने बताया कि आज के साइबर अपराधी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर रहे हैं जिससे वे बड़ी आसानी से लोगों का विश्वास जीत लेते हैं। 2026 में एआई का इस्तेमाल कर साइबर अपराधी बड़े पैमाने पर साइबर अपराध कर सकते हैं। ओटीपी मांगना पुराना पैटर्न हो चुका है और नए पैटर्न में मोबाइल हैक कर ओटीपी अपने आप हासिल कर ले रहे। ऐसे में केवल सतर्कता ही नहीं, बल्कि तकनीकी समझ और निरंतर जागरूकता भी अत्यंत आवश्यक है। अन्त में उन्होंने कहा कि साइबर अपराधों से लड़ाई केवल तकनीक या केवल जागरूकता से नहीं, बल्कि दोनों के समन्वय से ही जीती जा सकती है। समय की माँग है कि प्रत्येक नागरिक 'पहले सत्यापन, फिर विश्वास' की नीति अपनायें।
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