सूर्यमणि पाण्डेय @ जौनपुर। अपर सत्र न्यायाधीश पाक्सो उमेश कुमार की अदालत ने आपसी विवाद की वजह से पति पर अपनी ही नाबालिग पुत्री से दुष्कर्म करने का मुकदमा चलाने वाली पत्नी को दोषी पाते हुए तीन माह के कारावास व 5000 रुपए अर्थदंड से दंडित किया।
मामले के अनुसार 2017 में सरपतहा थाना क्षेत्र निवासी एक महिला ने अपने पति के ऊपर आरोप लगाया कि वह उसकी नाबालिग पुत्री से बलात्कार किया है जिसमें 24 दिसंबर 2025 को साक्ष्य के अभाव में न्यायालय ने पति को दोष मुक्त कर दिया और फर्जी मुकदमा करने के आरोप में पत्नी के खिलाफ प्रकीर्ण वाद दर्ज किया।
न्यायालय ने कहा पिता पुत्री का संबंध सिर्फ रक्त संबंध ही नहीं, बल्कि भरोसा, सम्मान और गहरे भावनात्मक जुड़ाव का रिश्ता है। पत्नी का यह कहना सही नहीं है कि वह दुष्कर्म का अर्थ नहीं जानती थी। उसके इस कृत्य से एक निर्दोष व्यक्ति का जीवन तबाह हो गया। उसे अपराध बोध लज्जा की अनुभूति हुई होगी। आरोप लगाते ही समाज आरोपी को दोषी मान लेता है तथा परिवार, मित्र, पड़ोसी और रिश्तेदार उससे दूरी बनाने लगते हैं। उसका सामाजिक बहिष्कार हो जाता है।
इसके अतिरिक्त आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तारी, जमानत, कानूनी प्रक्रिया और अदालत के खर्चे से हुए तनाव से गुजरना पड़ता है। यदि कोई पाक्सो ऐक्ट का दुरुपयोग करे और पिता पुत्री के रिश्ते को कलंकित करने का प्रयास करे तो इससे सामाजिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो जाएगा। अतः आरोपिता किसी प्रकार के रहम की पात्र नहीं है इसलिए अदालत ने उसे दंडित करते हुए जेल भेज दिया।
मामले के अनुसार 2017 में सरपतहा थाना क्षेत्र निवासी एक महिला ने अपने पति के ऊपर आरोप लगाया कि वह उसकी नाबालिग पुत्री से बलात्कार किया है जिसमें 24 दिसंबर 2025 को साक्ष्य के अभाव में न्यायालय ने पति को दोष मुक्त कर दिया और फर्जी मुकदमा करने के आरोप में पत्नी के खिलाफ प्रकीर्ण वाद दर्ज किया।
न्यायालय ने कहा पिता पुत्री का संबंध सिर्फ रक्त संबंध ही नहीं, बल्कि भरोसा, सम्मान और गहरे भावनात्मक जुड़ाव का रिश्ता है। पत्नी का यह कहना सही नहीं है कि वह दुष्कर्म का अर्थ नहीं जानती थी। उसके इस कृत्य से एक निर्दोष व्यक्ति का जीवन तबाह हो गया। उसे अपराध बोध लज्जा की अनुभूति हुई होगी। आरोप लगाते ही समाज आरोपी को दोषी मान लेता है तथा परिवार, मित्र, पड़ोसी और रिश्तेदार उससे दूरी बनाने लगते हैं। उसका सामाजिक बहिष्कार हो जाता है।
इसके अतिरिक्त आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तारी, जमानत, कानूनी प्रक्रिया और अदालत के खर्चे से हुए तनाव से गुजरना पड़ता है। यदि कोई पाक्सो ऐक्ट का दुरुपयोग करे और पिता पुत्री के रिश्ते को कलंकित करने का प्रयास करे तो इससे सामाजिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो जाएगा। अतः आरोपिता किसी प्रकार के रहम की पात्र नहीं है इसलिए अदालत ने उसे दंडित करते हुए जेल भेज दिया।
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