अभिनेत्री आयशा शर्मा अपनी रचनात्मक पहचान को एक नया आयाम दे रही हैं। अब वे पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के साथ बतौर लेखिका डेब्यू कर रही हैं। सोशल मीडिया पर अपनी दमदार मौजूदगी और एक गहराई से जुड़ी कम्युनिटी के लिए जानी जाने वाली आयशा शर्मा ने धीरे-धीरे अपनी एक अलग आवाज़ बनाई है, जो सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं है। इस किताब के जरिए वह अभिव्यक्ति का एक और रास्ता तलाश रही हैं—एक ऐसा रास्ता जो ठहराव, आत्मचिंतन और भावनात्मक ईमानदारी को जगह देता है।
उनकी पहली किताब सौ छोटे-छोटे ध्यानपूर्ण विचारों का संग्रह है, जो ताकत, कोमलता और आत्म-प्रेम के इर्द-गिर्द बुना गया है। रोजमर्रा की भावनाओं से जुड़ी यह किताब खास तौर पर उन लोगों के लिए है जो थकान, आत्म-संदेह और हर वक्त खुद को साबित करने के दबाव से जूझ रहे हैं। यह किताब हल देने का दावा नहीं करती, बल्कि एक ऐसा स्पेस बनाती है जहाँ पाठक खुद को पहचान सकें और एक सुकून भरी तसल्ली महसूस कर सकें।
किताब के पीछे की भावना साझा करते हुए आयशा शर्मा कहती हैं, "मेरा मानना है कि सही किताब आपको सही समय पर मिलती है। उम्मीद है यह किताब आपको तब मिले जब आपको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो। और जब मिले, तो आपको ऐसा महसूस हो जैसे किसी ने चुपचाप आपको गले लगा लिया हो। मेरे पास सारे जवाब नहीं हैं, लेकिन अगर मेरी लिखी बातों में आपको लगे कि 'ये तो वही एहसास है जिसे मैं हमेशा महसूस करती थी, पर शब्द नहीं दे पाती थी,' तो मेरे लिए वही काफी है।"
आयशा शर्मा के लिए लेखन उनकी डिजिटल मौजूदगी का स्वाभाविक विस्तार है, जहाँ आत्म-विकास, भावनात्मक संतुलन और अंदरूनी सफर जैसे विषय पहले से ही उनके दर्शकों से गहराई से जुड़ते हैं। यह नया अध्याय उनकी उस कोशिश को दर्शाता है जिसमें वह अभिनय, डिजिटल कहानी कहने और अब लेखन—तीनों के बीच सहजता से सफर करती हुई एक मुकम्मल क्रिएटिव पहचान गढ़ रही हैं।
https://www.instagram.com/reel/DUlGlpoCNei/?igsh=dDlpdzlraHIya24w
उनकी पहली किताब सौ छोटे-छोटे ध्यानपूर्ण विचारों का संग्रह है, जो ताकत, कोमलता और आत्म-प्रेम के इर्द-गिर्द बुना गया है। रोजमर्रा की भावनाओं से जुड़ी यह किताब खास तौर पर उन लोगों के लिए है जो थकान, आत्म-संदेह और हर वक्त खुद को साबित करने के दबाव से जूझ रहे हैं। यह किताब हल देने का दावा नहीं करती, बल्कि एक ऐसा स्पेस बनाती है जहाँ पाठक खुद को पहचान सकें और एक सुकून भरी तसल्ली महसूस कर सकें।
किताब के पीछे की भावना साझा करते हुए आयशा शर्मा कहती हैं, "मेरा मानना है कि सही किताब आपको सही समय पर मिलती है। उम्मीद है यह किताब आपको तब मिले जब आपको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो। और जब मिले, तो आपको ऐसा महसूस हो जैसे किसी ने चुपचाप आपको गले लगा लिया हो। मेरे पास सारे जवाब नहीं हैं, लेकिन अगर मेरी लिखी बातों में आपको लगे कि 'ये तो वही एहसास है जिसे मैं हमेशा महसूस करती थी, पर शब्द नहीं दे पाती थी,' तो मेरे लिए वही काफी है।"
आयशा शर्मा के लिए लेखन उनकी डिजिटल मौजूदगी का स्वाभाविक विस्तार है, जहाँ आत्म-विकास, भावनात्मक संतुलन और अंदरूनी सफर जैसे विषय पहले से ही उनके दर्शकों से गहराई से जुड़ते हैं। यह नया अध्याय उनकी उस कोशिश को दर्शाता है जिसमें वह अभिनय, डिजिटल कहानी कहने और अब लेखन—तीनों के बीच सहजता से सफर करती हुई एक मुकम्मल क्रिएटिव पहचान गढ़ रही हैं।
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