विरेन्द्र यादव @ सरायख्वाजा, जौनपुर। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट सभागार में गुरुवार को इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट (आईपीआर) सेल की ओर से एक दिवसीय कार्यशाला हुआ। कार्यशाला का विषय "बौद्धिक संपदा अधिकार : उभरती प्रवृत्तियाँ और चुनौतियाँ" रहा। आशीर्वचन में कुलपति प्रो. वंदना सिंह ने कहा कि "इन्वेंशन ही एसेट है"। किसी भी संस्थान अथवा शोधकर्ता के लिए नवाचार उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि नए विचारों, शोध कार्यों और आविष्कारों को सही दिशा में संरक्षित किया जाए तो वही आर्थिक उन्नति और सामाजिक विकास का मजबूत आधार बनते हैं। विश्वविद्यालयों को नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक सहगल ने कहा कि डिजिटल युग में बौद्धिक संपदा अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। यदि सृजनकर्ता जागरूक नहीं रहेगा तो उसके नवाचार, शोध एवं रचनात्मक कार्य का दुरुपयोग हो सकता है। उन्होंने पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क आदि के पंजीकरण की विधि को विस्तार से समझाते हुए समयबद्ध फाइलिंग की आवश्यकता पर बल दिया।
भारतीय पेटेंट कार्यालय नई दिल्ली के सहायक नियंत्रक (पेटेंट एवं डिज़ाइन) आलोक मिश्रा ने कहा कि नवाचार को संरक्षित करना राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि देश को विकसित करने के लिए आईपीआर सेक्टर को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने पेटेंट आवेदन की प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली तथा स्टार्टअप एवं शैक्षणिक संस्थानों को मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी दी।
कमला नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान (के.एन.आई.टी.) सुल्तानपुर के एसोसिएट प्रोफेसर प्रदीप कुमार ने कहा कि तकनीकी संस्थानों में शोध को उद्योग से जोड़ते समय आईपीआर की समझ आवश्यक है। इससे शोध का व्यावसायीकरण संभव होता है और नवाचार को उचित पहचान मिलती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विधि संकाय के डॉ. अभिषेक कुमार ने कहा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में बौद्धिक संपदा अधिकार आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बन चुका है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समझौतों और भारतीय कानूनों के समन्वय पर प्रकाश डाला।
टीडी लॉ कॉलेज के डॉ. यशवंत सिंह ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार कानून और नवाचार के बीच सेतु का कार्य करता है। विधि के विद्यार्थियों को आईपीआर के बदलते स्वरूप और न्यायिक दृष्टिकोण की जानकारी होना समय की मांग है। इसके पहले आईपीआर सेल के नोडल अधिकारी प्रो. रवि प्रकाश ने स्वागत भाषण कर कार्यशाला की रूप—रेखा पर प्रकाश डाला। समापन सत्र में परीक्षा नियंत्रक डॉ विनोद सिंह ने कहा कि डिजीटल युग में अपने हर शोध हो या सृजन उसके प्रति सजग रहने की जरूरत है। इसी के तहत हर संस्थाओं में आपीआर सेल का गठन हो रहा है। संचालन डॉ. रसिकेश और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. प्रदीप कुमार ने किया।
इस अवसर पर प्रो. प्रमोद यादव, प्रो. राजेश शर्मा, प्रो. विनोद कुमार, प्रो. प्रमोद कुमार, डॉ. सुनील कुमार, डॉ. मंगला प्रसाद यादव, डॉ. नीतेश जायसवाल, डॉ. प्रवीण सिंह, डॉ. नीरज अवस्थी, डॉ. जया शुक्ला, डॉ. नृपेन्द्र सिंह, पूनम सोनकर, डॉ. ज्योति सिंह, डॉ. अजय मौर्य, डॉ. सुधीर सिंह, डॉ. शैलेश प्रजापति, रीतेश बरनवाल सहित तमाम शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक सहगल ने कहा कि डिजिटल युग में बौद्धिक संपदा अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। यदि सृजनकर्ता जागरूक नहीं रहेगा तो उसके नवाचार, शोध एवं रचनात्मक कार्य का दुरुपयोग हो सकता है। उन्होंने पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क आदि के पंजीकरण की विधि को विस्तार से समझाते हुए समयबद्ध फाइलिंग की आवश्यकता पर बल दिया।
भारतीय पेटेंट कार्यालय नई दिल्ली के सहायक नियंत्रक (पेटेंट एवं डिज़ाइन) आलोक मिश्रा ने कहा कि नवाचार को संरक्षित करना राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि देश को विकसित करने के लिए आईपीआर सेक्टर को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने पेटेंट आवेदन की प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली तथा स्टार्टअप एवं शैक्षणिक संस्थानों को मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी दी।
कमला नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान (के.एन.आई.टी.) सुल्तानपुर के एसोसिएट प्रोफेसर प्रदीप कुमार ने कहा कि तकनीकी संस्थानों में शोध को उद्योग से जोड़ते समय आईपीआर की समझ आवश्यक है। इससे शोध का व्यावसायीकरण संभव होता है और नवाचार को उचित पहचान मिलती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विधि संकाय के डॉ. अभिषेक कुमार ने कहा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में बौद्धिक संपदा अधिकार आर्थिक विकास का प्रमुख आधार बन चुका है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समझौतों और भारतीय कानूनों के समन्वय पर प्रकाश डाला।
टीडी लॉ कॉलेज के डॉ. यशवंत सिंह ने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार कानून और नवाचार के बीच सेतु का कार्य करता है। विधि के विद्यार्थियों को आईपीआर के बदलते स्वरूप और न्यायिक दृष्टिकोण की जानकारी होना समय की मांग है। इसके पहले आईपीआर सेल के नोडल अधिकारी प्रो. रवि प्रकाश ने स्वागत भाषण कर कार्यशाला की रूप—रेखा पर प्रकाश डाला। समापन सत्र में परीक्षा नियंत्रक डॉ विनोद सिंह ने कहा कि डिजीटल युग में अपने हर शोध हो या सृजन उसके प्रति सजग रहने की जरूरत है। इसी के तहत हर संस्थाओं में आपीआर सेल का गठन हो रहा है। संचालन डॉ. रसिकेश और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. प्रदीप कुमार ने किया।
इस अवसर पर प्रो. प्रमोद यादव, प्रो. राजेश शर्मा, प्रो. विनोद कुमार, प्रो. प्रमोद कुमार, डॉ. सुनील कुमार, डॉ. मंगला प्रसाद यादव, डॉ. नीतेश जायसवाल, डॉ. प्रवीण सिंह, डॉ. नीरज अवस्थी, डॉ. जया शुक्ला, डॉ. नृपेन्द्र सिंह, पूनम सोनकर, डॉ. ज्योति सिंह, डॉ. अजय मौर्य, डॉ. सुधीर सिंह, डॉ. शैलेश प्रजापति, रीतेश बरनवाल सहित तमाम शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
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