Jaunpur : ​सांसारिक बन्धनों से मुक्ति का साधन है श्रीमद्भागवत कथा: आचार्य शान्तनु

सुइथाकला, जौनपुर। स्थानीय विकास खण्ड क्षेत्र के सुइथाकला गांव में यमुना प्रसाद सिंह के निवास पर चल रही सप्त दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस पर सरस कथा व्यास आचार्य शान्तनु जी महाराज ने उपस्थित श्रोताओं को भागवत कथा सुनाते हुए कहा कि राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से पूछा कि मरने वाले को क्या करना चाहिए? परीक्षित के प्रश्न से हर्षित होकर शुकदेव जी ने कहा कि मरण के 7 ही दिन होते हैं लेकिन जिन्हें मृत्यु के भय से मुक्त होना है। वे भगवान की कथा श्रवण करके सांसारिक बन्धनों से मुक्त होने के साथ ही मृत्यु के भय से भी मुक्त हो जाते हैं। अचल भक्ति प्रभु के प्रति प्रीति के बिना सम्भव नहीं है।जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।। इसलिए संसार में जो कुछ भी दिखता है, उसे परमात्मा की लीला का विस्तार मानना चाहिए और उन्हीं परमात्मा का ध्यान करते हुए उन्हीं की सृष्टि में निरंतर आनन्द का अनुभव करना चाहिए। जगत से आसक्ति ही सुख-दुख का कारण है। वास्तव में मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है। अगर मन संसार के प्रति आसक्त है तो वह दुख का कारण बन जाता है। यही आसक्ति अगर परमात्मा की भक्ति बन जाय तो प्राणि मात्र के लिए मोक्ष का द्वार स्वयं खुल जाता है। संत प्रवर ने कहा कि सब कुछ देकर कुछ न लेने वाला केवल परमात्मा ही है। आचार्य ने देव पूजा विषयक तत्व का ज्ञान कराते हुए कहा कि संसार में समस्त प्राणियों को सकाम या निष्काम भाव से ईश्वर की पूजा अवश्य करनी चाहिए। कथा के क्रम में आचार्य ने संसार की रचना के विषय में भगवान के नाभिकमल से उत्पन्न व्रह्मादिक लीलाओं का अनुपम गुणगान किया। भागवत कथा पूजन के क्रम में मुख्य यजमान यमुना प्रसाद सिंह ने सपत्नीक परिवार के साथ पूजन एवं आरती किया। श्रीमद्भागवत कथा संयोजक के रूप में रमेश सिंह, डाॅ. उमेश सिंह, डाॅ. दिनेश सिंह के अलावा भारी संख्या में भागवत कथा प्रेमीजन उपस्थित रहे।

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