डा. प्रदीप दूबे @ सुइथाकला, जौनपुर। स्थानीय क्षेत्र के सुइथाकला गांव में यमुना प्रसाद सिंह के निवास पर चल रही सप्त दिवसीय संगीतमय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के द्वितीय दिवस पर सरस कथा व्यास आचार्य शान्तनु महाराज ने उपस्थित श्रोताओं को पिबत भागवतम रसमालयम की कथा का रसपान कराते हुए कहा कि रसिकों और भावुकों को सुनने के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा कृष्णरस से सिक्त होकर पीने योग्य है।
नैमिषारण्य में शौनक जी के नेतृत्व में सनकादिक ॠषियों ने सूत जी से श्रीमद्भागवत महापुराण आधारित के 6 प्रश्न किये। प्रश्नों के क्रम में प्राणिमात्र का कल्याण कैसे हो। सम्पूर्ण शास्त्रों का सार क्या है। भगवान अजन्मा होते हुए अवतार क्यों लेते हैं। भगवान अवतार लेकर कौन से कार्य करते हैं। भगवान के कुल अवतार कितने हैं। धर्म किसकी शरण में स्थित रहता है। ये प्रश्न कलियुग में भक्ति, मोक्ष और जीवन के उद्देश्य को समझाने के लिए पूछे गए थे। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में सम्पूर्ण भागवत समाहित है जिनके उत्तर सूत जी ने भागवत कथा के माध्यम से दिये।भागवत कथा के क्रम में आचार्य ने कहा कि जीव का परम धर्म ईश्वर से प्रेम और भक्ति का है, उसे साकार, निराकार अनेक प्रकार से लोग जानते हैं। एकं सत विप्रा: बहुधा वदन्ति को जीव मनुष्य योनि पाकर ही समझ सकता है और परम तत्व को प्राप्त कर सकता है। साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सुधारा ।कथा के मध्य में मेरी लगी श्याम संग प्रीत ये दुनिया क्या जाने, भजन सुनकर उपस्थित भक्तजन भाव विभोर हो गये। कथा समापन पर उपस्थित भक्तजन आरती और प्रसाद ग्रहण किये। श्रीमद्भागवत कथा संयोजक के रूप में रमेश सिंह, डाॅ. उमेश सिंह, डाॅ. दिनेश सिंह आदि सम्मिलित रहे। इस अवसर पर भारी संख्या में भागवत कथा प्रेमीजन उपस्थित रहे।
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