धान की सीधी बुवाई एक आधुनिक और कम लागत वाली तकनीक है जिसमें नर्सरी तैयार किए बिना सीधे खेत में बीज बोए जाते हैं। यह विधि 25 मई से 10 जून तक का समय सबसे उपयुक्त बुवाई के लिए मानी जाती है। इसमें पानी 20 से 30% कम ,15 से 20% कम लागत और कम मजदूरी लगती है। इस विधि में जीरोटिल/सीडड्रिल से 1 से 2 इंच की गहराई पर धान की बुवाई की जाती है। प्रति एकड़ 8 से 10 किग्रा बीच की जरूरत पड़ती है बुवाई के तुरंत बाद 24 से 36 घंटे के अंदर पेंडिमेथिलिन दवा का छिड़काव करना चाहिए। पहली सिंचाई बुवाई के 15 से 20 दिन बाद करनी चाहिए। इसमें खेत में पानी खड़ा नहीं किया जाता है, बल्कि खेत में बराबर नमी बनाए रखना जरूरी है। बार—बार जमीन सूखने पर सिंचाई करने से मृदा में वायु संचार बढ़ता है फलस्वरूप उत्पादन अधिक प्राप्त होता है।
उन्होंने बताया कि सब मिशन ऑन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन "आत्मा" योजना अन्तर्गत खरीफ मौसम में कुल 150 हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान फसल की सीधी बुवाई (डीएसआर) तकनीक से प्रदर्शन कराए जाएंगे, प्रर्दशन प्रक्षेत्रों पर अन्य किसानों द्वारा प्रक्षेत्र दिवस आयोजित कर इस तकनीकी का प्रचार—प्रसार किया जायेगा, ताकि जनपद के किसान कम पानी, कम उर्वरक,कम लागत में पर्यावरण का संरक्षण करते हुए बेहतर उत्पादन प्राप्त कर अपनी समृद्धि करते हुए आत्म निर्भर बन सकें। धान की डीएसआर तकनीकी से पानी, समय और मजदूरी की बचत के साथ ग्रीन हाउस गैस मुख्यतः मिथेन गैस का उत्सर्जन कम होता है। सीधी बुवाई में खर—पतवार एक बड़ी चुनौती है, इसलिए सही समय पर निराई गुड़ाई कर खरपतवार नाशी का प्रबंधन करके कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर पर्यावरण को भी संरक्षित किया जा सकता है।
