श्री कृष्णा न्यूरो एवं मानसिक रोग चिकित्सालय पर हुई जागरूकता संगोष्ठी
जौनपुर। विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर श्री कृष्णा न्यूरो एवं मानसिक रोग चिकित्सालय नईगंज में विशेष जनजागरूकता संगोष्ठी हुई जहां चिकित्सालय के प्रबन्ध निदेशक एवं प्रख्यात न्यूरो साइकेट्रिस्ट विशेषज्ञ डॉ. हरिनाथ यादव ने उपस्थित लोगों और मरीजों को तम्बाकू के जानलेवा प्रभावों के प्रति जागरूक किया।
इसके पहले कार्यक्रम की शुरुआत करते हुये डा. यादव ने बताया कि तम्बाकू का सेवन केवल एक बुरी आदत या शौक नहीं है, बल्कि मेडिकल साइंस (डीएसएम-5) के अनुसार यह एक गंभीर मानसिक बीमारी है जिसे टोबैको यूज़ डिसऑर्डर कहा जाता है। वैज्ञानिक तथ्यों के साथ तम्बाकू के खतरों और इसे छोड़ने के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुये बताया कि तम्बाकू में मौजूद निकोटीन इंसान के दिमाग को अपना गुलाम बना लेता है। निकोटीन सेवन के मात्र 7 सेकंड के भीतर दिमाग के रिवॉर्ड पाथवे पर कब्जा कर लेता है और डोपामाइन (खुशी का अहसास कराने वाले न्यूरोकेमिकल) का एक नकली चक्र शुरू करता है। इसके बाद धीरे-धीरे दिमाग इस नकली डोपामाइन का आदी हो जाता है। जब इंसान तंबाकू नहीं लेता तो दिमाग में तीव्र छटपटाहट, अत्यधिक गुस्सा, घबराहट और चिड़चिड़ापन शुरू हो जाता है जिसे निकोटीन विड्रॉल कहते हैं। इसी मानसिक मजबूरी के कारण लोग चाहकर भी इसे छोड़ नहीं पाते।
डॉ. यादव ने सचेत किया कि तम्बाकू सिर्फ फेफड़ों को ही नहीं, बल्कि सिर से लेकर पैर तक पूरे सिस्टम को तबाह कर देता है। तम्बाकू नसों को सिकोड़कर खून को गाढ़ा कर देता है जिससे दिमाग में थक्के जम जाते हैं और पैरालिसिस या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। लम्बे समय तक सेवन से सोचने-समझने की क्षमता खत्म होने लगती है और अल्जाइमर का खतरा 40 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। यह दिमाग के नेचुरल सेरोटोनिन और डोपामाइन को सुखा देता है जिससे व्यक्ति गहरे अवसाद (डिप्रेशन) में चला जाता है। इससे मुँह, जीभ, गले, भोजन नली और फेफड़ों का जानलेवा कैंसर हो सकता है। धमनियों में ब्लॉकेज के कारण बेहद कम उम्र में साइलेंट हार्ट अटैक आना सामान्य हो जाता है।
उन्होंने समाज को संदेश दिया कि इस मानसिक गुलामी से पूरी तरह छुटकारा पाना सम्भव है, बशर्ते सही चिकित्सीय सलाह ली जाय। निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी में पैच या गम के माध्यम से वैज्ञानिक तरीके से धीरे-धीरे लत को कम किया जाता है। न्यूरो-साइकियाट्री में ऐसी आधुनिक एंटी-क्रैविंग दवाएं उपलब्ध हैं जो तम्बाकू की तीव्र इच्छा को दिमाग के स्तर पर ही ब्लॉक कर देती हैं। बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) के माध्यम से काउंसिलिंग और व्यवहार परिवर्तन तकनीकों द्वारा मरीज को मानसिक रूप से मजबूत बनाया जाता है, ताकि वह दोबारा इस जाल में न फंसे।
संगोष्ठी के समापन पर डॉ. हरिनाथ यादव ने चिकित्सालय स्टाफ सहित मौजूद सभी नागरिकों को जीवन भर तम्बाकू और किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहने तथा दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करने का संकल्प दिलाया। इस अवसर पर क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रतिमा यादव, डॉ. सुशील यादव, नितिन कुमार, शिव बहादुर, लालजी सहित समस्त हॉस्पिटल स्टाफ, मरीज, परिजन उपस्थित रहे।
