गोंदिया - वैश्विक स्तरपर 26 जुलाई 2026 तक विश्व के विभिन्न हिस्सों से जो समाचार सामने आए हैं,वे केवल अलग -अलग प्राकृतिक आपदाओं की खबरें नहीं हैं, बल्कि यह संकेत हैं कि पृथ्वी अब जलवायु परिवर्तन के ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ चरम मौसम अपवाद नहीं, बल्कि नई वास्तविकता बनता जा रहा है। भारत के असम में विनाशकारी बाढ़,दिल्ली सहित उत्तर भारत में अत्यधिक वर्षा की चेतावनी, यूरोप के फ्रांस और स्पेन में भीषण जंगल की आग, अमेरिका और एशिया में लगातार गर्मी की लहरें तथा समुद्री तापमान में वृद्धि,ये सभी घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। वैज्ञानिक वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि वैश्विक तापमान को नियंत्रित नहीं किया गया तो वर्षा,सूखा, बाढ़,चक्रवात और जंगल की आग जैसी घटनाएँ अधिक तीव्र और अधिक बार होंगी।आज यह भविष्यवाणी वास्तविकता का रूप ले चुकी है।असम में बाढ़ की स्थिति 18 जुलाई 2026 से गंभीर रूप से उभरनी शुरू हुई,26 जुलाई 2026 तक भी बाढ़ की स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थी और राहत कार्य जारी थे। जलवायु परिवर्तन के कारण असम में आई भीषण बाढ़ से लगभग 6.5 लाख लोग प्रभावित हुए हैं और 66 लोगों की मृत्यु हुई है,दक्षिणी फ्रांस में बड़े पैमाने पर जंगलों में आग की घटनाएँ 5 जुलाई 2026 से शुरू हुई थीं।लेकिन 24-26 जुलाई 2026 के दौरान भीषण हीटवेव और तेज़ हवाओं के कारण आग ने विकराल रूप ले लिया। फ्रांस के बोर्डो और स्पेन के कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजना पड़ा तथा राष्ट्रीय स्तर पर आपातकालीन कार्रवाई की गई। जबकि यूरोप के जंगलों में लगी आग (दावानल) और भीषण गर्मी से दर्जनों लोगों की जान गई है तथा 1,16, 000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि जलवायु परिवर्तन केवल प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें मानवीय हस्तक्षेप की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। अनियंत्रित औद्योगिकीकरण, अंधाधुंध वनों की कटाई, जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग,अवैध खनन,नदियों और आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण तथा अनियोजित शहरीकरण ने प्रकृति का संतुलन गंभीर रूप से बिगाड़ा है। चिंता का विषय यह भी है कि अनेक देशों में पर्यावरण संरक्षण संबंधी कानून तो बनाए गए, किंतु उनके प्रभावी क्रियान्वयन में ढिलाई, निगरानी तंत्र की कमजोरी और उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध समयबद्ध एवं कठोर कार्रवाई का अभाव दिखाई देता है। साथ ही, आम नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति व्यापक जनजागरूकता अभियान अपेक्षित स्तर पर नहीं चल पाए हैं। परिणामस्वरूप, सरकार, उद्योग, स्थानीय प्रशासन और समाज,सभी की साझा जिम्मेदारी होने के बावजूद सामूहिक प्रयास पर्याप्त गति नहीं पकड़ सके हैं। अब आवश्यकता केवल नए कानून बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों के प्रभावी पालन, पारदर्शी निगरानी और व्यापक जनभागीदारी के माध्यम से जलवायु संरक्षण को जनआंदोलन का रूप देने की है।
साथियों पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का विषय नहीं रहा,बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक अर्थव्यवस्था, कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, बीमा उद्योग, वित्तीय बाजार और मानव अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व मौसम संगठन, आईपीसीसी तथा विश्व बैंक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में करोड़ों लोग विस्थापन, जल संकट और खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगे। 2026 में घट रही घटनाएँ इसी गंभीर चेतावनी का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में इस वर्ष आई बाढ़ ने लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। अनेक जिलों में नदियाँ खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं,हजारों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं तथा कृषि, सड़क,पुल और सार्वजनिक ढाँचे को भारी क्षति पहुँची है।असम की बाढ़ कोई नई घटना नहीं है, परंतु वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, ग्लेशियरों के पिघलने की गति तथा मौसम की अनिश्चितता ने बाढ़ की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ा दी हैं। ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी अब पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित व्यवहार कर रही है, जिससे आपदा प्रबंधन की चुनौती कई गुना बढ़ गई है।उधर उत्तर भारत में भारतीय मौसम विभाग द्वारा भारी वर्षा के लगातार अलर्ट यह संकेत देते हैं कि मानसून अब पहले जैसा नियमित और संतुलित नहीं रहा। कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ता है तो कहीं कुछ घंटों में महीने भर की वर्षा हो जाती है। यही जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी पहचान है,मौसम का असंतुलन। इससे शहरी बाढ़, भूस्खलन,फसल क्षति, यातायात अवरोध और जनजीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। बड़े महानगरों की जल निकासी व्यवस्था भी इस नई जलवायु चुनौती के सामने सटीकता से कमजोर साबित हो रही है।
साथियों, दूसरी ओर यूरोप के फ्रांस और स्पेन में जंगलों की आग ने हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र को नष्ट कर दिया है। भीषण गर्मी, शुष्क हवाएँ और लंबे समय तक वर्षा न होना इन आगों को और अधिक खतरनाक बना रहे हैं। जंगलों की आग केवल पेड़ों को नहीं जलाती, बल्कि करोड़ों टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में छोड़ती है, जिससे वैश्विक तापमान और बढ़ता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन और जंगल की आग एक-दूसरे को और अधिक गंभीर बनाते हैं। इसे वैज्ञानिक क्लाइमेट फीडबैक लूप कहते हैं।जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव कृषि पर पड़ रहा है। अनियमित वर्षा अत्यधिक तापमान और बाढ़-सूखे के चक्र ने खाद्यान्न उत्पादन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह केवल किसानों की समस्या नहीं,बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था,खाद्य महँगाई और सामाजिक स्थिरता का विषय है।यदि धान,गेहूँ, दालें, फल और सब्जियों का उत्पादन प्रभावित होगा तो इसका सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब और महँगाई दर पर दिखाई देगा। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन अब केंद्रीय बैंकों और वित्त मंत्रालयों क़ा भी सटीकता से चिंता का विषय बन चुका है।
साथियों, स्वास्थ्य आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र पर भी इसका गहरा प्रभाव दिखाई दे रहा है। बढ़ती गर्मी से हीट स्ट्रोक, हृदय रोग, श्वसन रोग और जलजनित बीमारियाँ बढ़ रही हैं। बाढ़ के बाद डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया और जल प्रदूषण से फैलने वाले रोगों का खतरा कई गुना बढ़जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि 21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक होगा।आर्थिक दृष्टि से देखें तो प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति बीमा कंपनियों, बैंकों, निवेशकों और शेयर बाजारों के लिए भी चुनौती बन रही है। बाढ़,चक्रवात और जंगल की आग से होने वाले नुकसान का वित्तीय बोझ लगातार बढ़ रहा है। सरकारों को राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण पर अधिक खर्च करना पड़ रहा है। इससे विकास परियोजनाओं और सामाजिक योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। जलवायु परिवर्तन इसलिए केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की गति का भी प्रश्न है।ऊर्जा सुरक्षा भी इस संकट से अछूती नहीं है। अत्यधिक तापमान के कारण बिजली की माँग रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच जाती है,जबकि सूखे के कारण जल विद्युत उत्पादन प्रभावित होता है। दूसरी ओर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और अधिक बढ़ता है। इसलिए सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्षता अब केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकता बन चुके हैं।
साथियों, विश्व स्तरपर सीओंपी सम्मेलनों में अनेक देशों ने नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया है। भारत ने भी 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य रखा है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, इलेक्ट्रिक वाहनों, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन तथा ऊर्जा संक्रमण पर तेजी से कार्य कर रहा है। किंतु विशेषज्ञों का मत है कि केवल सरकारी नीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी; उद्योग, नगर प्रशासन, कृषि क्षेत्र और आम नागरिकों की भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है।भारत के लिए जलवायु परिवर्तन का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहाँ हिमालय, लंबी समुद्री तटरेखा, विशाल कृषि क्षेत्र और करोड़ों लोगों की आजीविका सीधे मौसम पर निर्भर है। हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र स्तर का बढ़ना, चक्रवातों की तीव्रता, हीट वेव और अनियमित मानसून आने वाले वर्षों में भारत की विकास रणनीति को प्रभावित करेंगे। इसलिए जलवायु अनुकूल बुनियादी ढाँचा, स्मार्ट जल प्रबंधन, शहरी नियोजन और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली पर बड़े निवेश की आवश्यकता है।आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता,उपग्रह प्रौद्योगिकी,ड्रोन,बिग डेटा और मौसम मॉडलिंग जलवायु प्रबंधन के महत्वपूर्ण उपकरण बन चुके हैं। बेहतर पूर्वानुमान, समय पर चेतावनी, फसल सलाह और आपदा प्रबंधन में इन तकनीकों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। भविष्य का सफल राष्ट्र वही होगा जो विज्ञान, तकनीक और नीति के समन्वय से जलवायु जोखिमों का प्रभावी प्रबंधन कर सके।जलवायु परिवर्तन का समाधान केवल उत्सर्जन कम करना नहीं है, बल्कि अनुकूलन और लचीलापन विकसित करना भी है। वर्षा जल संचयन,वनों का संरक्षण, नदी पुनर्जीवन, टिकाऊ कृषि, हरित परिवहन,ऊर्जा दक्ष भवन प्लास्टिक प्रदूषण में कमी और जनभागीदारी जैसे उपाय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।प्रत्येक नागरिक यदि अपने दैनिक जीवन में ऊर्जा बचत, जल संरक्षण और पर्यावरण- अनुकूल व्यवहार अपनाए,तो सामूहिक स्तर पर बड़ा परिवर्तन संभव है।
*-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*
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