Entertainment : "मेरे पास दो ही रास्ते थे... या तो टूट जाता, या उसे कहानी बना देता" 'धंधो' पर बोले मुनव्वर फारुकी


ज़्यादातर लोग अपनी ज़िंदगी के दर्दभरे पन्नों को पीछे छोड़ देना चाहते हैं। लेकिन मुनव्वर फारुकी ने उसी दर्द को अपनी अब तक की सबसे पर्सनल स्टैंड अप स्पेशल 'धंधो' की नींव बना दिया।

रोजमर्रा की ज़िंदगी में हंसी ढूंढने के लिए पहचाने जाने वाले मुनव्वर इस बार दर्शकों को कहीं ज़्यादा गहरी और भावनात्मक यात्रा पर ले जाते हैं। 'धंधो' में वह अपनी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल दौर में से एक, साल 2021 में जेल में बिताए गए 37 दिनों और उसके बाद की भावनात्मक उथल पुथल के बारे में खुलकर बात करते हैं।

गुस्से या कड़वाहट के बजाय मुनव्वर ने इस अनुभव को पूरी ईमानदारी से बयां किया है। वह डर, अनिश्चितता, अकेलेपन और उस जद्दोजहद की बात करते हैं, जब लगता है कि ज़िंदगी से सब कुछ छिन गया है। लेकिन अपनी पहचान के मुताबिक वह अंधेरे में भी हंसी के पल ढूंढ लेते हैं और याद दिलाते हैं कि कई बार मुश्किल दिनों से निकलने का सबसे बड़ा सहारा सिर्फ हंसना होता है।

मुनव्वर के लिए 'धंधो' सिर्फ एक और स्टैंड अप स्पेशल नहीं है, बल्कि उनकी ज़िंदगी के उस दौर की कहानी है जिसने उन्हें निजी और प्रोफेशनल दोनों स्तर पर बदल दिया। उस अध्याय को अपनी पहचान बनने देने के बजाय उन्होंने फैसला किया कि वह अपनी कहानी अपने अंदाज़ में सुनाएंगे।

स्पेशल के बारे में बात करते हुए मुनव्वर ने कहा,
"वो 37 दिन मेरी कॉमेडियन वाली जर्नी खत्म करने वाले थे। लेकिन वही मेरी अब तक की सबसे पर्सनल स्टैंड अप शो लिखने की वजह बन गए। मैंने किसी और पर जोक्स नहीं बनाए, मैंने खुद को ही पंचलाइन बनाया, क्योंकि मेरे लिए ह्यूमर ही ज़िंदा रहने का तरीका बन गया था। जिस दौर ने मुझे सबसे बड़ा नुकसान दिया, उसी ने मेरी सबसे बड़ी वापसी भी कराई। कई बार ज़िंदगी हालात बदलने से नहीं बदलती, बल्कि तब बदलती है जब आप अपनी कहानी को खुद अपनाते हैं।"

'धंधो' को दर्शकों से जोड़ने वाली सबसे बड़ी बात इसकी सच्चाई है। जोक्स से आगे बढ़कर यह उस इंसान की कहानी है जो अपने दर्द को समझने, खुद को फिर से संभालने और आगे बढ़ने की कोशिश करता है। यह याद दिलाती है कि ठोकरें आखिरी मंजिल तय नहीं करतीं और सबसे मुश्किल अनुभव भी एक बड़ी कमबैक स्टोरी का हिस्सा बन सकते हैं।

रिलीज़ के बाद से दर्शकों ने 'धंधो' को सिर्फ इसकी कॉमेडी के लिए नहीं, बल्कि इसकी सच्चाई और ईमानदारी के लिए भी खूब सराहा है। कई लोगों ने मुनव्वर की तारीफ की कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी के सबसे कमजोर और कठिन दौर को इतनी बेबाकी से साझा किया और उसे हिम्मत, उम्मीद और खुद पर भरोसा रखने वाली कहानी में बदल दिया।

'धंधो' के ज़रिए मुनव्वर फारुकी सिर्फ लोगों को हंसा नहीं रहे, बल्कि यह भी बता रहे हैं कि कई बार सबसे ज़्यादा दर्द देने वाली कहानियां ही सबसे ज़्यादा सुनाए जाने लायक होती हैं।
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