– रवि रमेशचंद्र शुक्ल, एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति" केवल एक नारा नहीं, बल्कि विद्यार्थी परिषद के संपूर्ण आंदोलन का मूल दर्शन है, जो छात्रों को 'कल के नहीं, बल्कि आज के नागरिक' के रूप में स्थापित करता है। भारत के इतिहास में युवा और विशेषकर छात्र आंदोलनों का एक विशिष्ट और गौरवशाली स्थान रहा है। यह परंपरा आधुनिक युग की देन नहीं है, बल्कि इसके सूत्र सुदूर अतीत में तक्षशिला विश्वविद्यालय के उन विद्यार्थियों से जुड़ते हैं, जिन्होंने नंद वंश के कुशासन के विरुद्ध और सिकंदर के आक्रमण से राष्ट्र की रक्षा के लिए एक एकीकृत छात्र आंदोलन का सूत्रपात किया था। उस ऐतिहासिक आंदोलन के मूल में सांस्कृतिक-आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की चेतना, राष्ट्र की एकता और सुशासन की स्थापना सर्वोपरि थी। इतिहास गवाह है कि छात्र सदैव परिवर्तन और युगांतरकारी क्रांतियों के उत्प्रेरक रहे हैं। यद्यपि छात्र आंदोलनों का नेतृत्व कॉलेज और विश्वविद्यालय परिसरों से होता है, किंतु उनके सरोकार केवल अकादमिक परिसरों तक सीमित नहीं होते। विद्यार्थी समाज के सजग प्रहरी, नीति-निर्माता और जिम्मेदार नागरिक होते हैं; इसलिए राष्ट्र का हर सामाजिक, सांस्कृतिक या विधिक निर्णय उन्हें सीधे प्रभावित करता है। स्वतंत्रता के पश्चात देश के छात्र परिदृश्य पर एक बड़ा वैचारिक शून्य और असंतोष देखा गया। तत्कालीन समय में कम्युनिस्ट और कांग्रेस समर्थित छात्र संगठन सक्रिय थे, किंतु उनके नेताओं और सदस्यों की अत्यधिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा तथा दलीय राजनीति में सीधे संलिप्तता ने सामान्य छात्रों को निराश किया। ऐसे में एक ऐसे छात्र संगठन की आवश्यकता तीव्रता से महसूस की गई, जो दलीय राजनीति से सर्वथा मुक्त हो और जिसका ध्येय केवल सत्ता-लोलुपता न होकर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, सेवा और राष्ट्रभक्ति हो। इसी वैचारिक मंथन के परिणामस्वरूप 5 जून 1948 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की नींव पड़ी, जिसकी औपचारिक घोषणा 'पाञ्चजन्य' पत्रिका के माध्यम से देश के युवाओं के समक्ष की गई। 9 जुलाई 1949 को इसे आधिकारिक रूप से पंजीकृत किया गया। अंबाला में इसके पहले अधिवेशन के साथ प्रोफेसर ओम प्रकाश बहल इसके प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष और श्री केशव देव वर्मा प्रथम राष्ट्रीय महासचिव बने। विद्यार्थी परिषद की सांगठनिक यात्रा और वैचारिक विस्तार में वर्ष 1967 एक मील का पत्थर साबित हुआ, जब प्राध्यापक यशवंतराव केलकर इसके अध्यक्ष बने। अपनी दूरदृष्टि, प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता से उन्होंने परिषद की कार्यपद्धति का खाका खींचा, जिसके कारण उन्हें संगठन का 'मुख्य वास्तुकार' (चीफ आर्किटेक्ट) माना जाता है। उन्होंने छात्र-शिक्षक समन्वय और नि:स्वार्थ राष्ट्रसेवा को संगठन के मूल में रखा। वर्तमान में एबीवीपी देश ही नहीं, बल्कि विश्व का सबसे बड़ा और दीर्घकालिक सक्रिय छात्र आंदोलन बन चुका है। संगठन का वैचारिक ढांचा तीन स्तंभों पर टिका है: 'ज्ञान, शील और एकता'। यह त्रयी केवल अकादमिक उत्कृष्टता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों के भीतर चरित्र निर्माण और सामाजिक चेतना का संचार करती है। परिषद की कार्यपद्धति को तीन मुख्य आयामों में विभाजित किया जा सकता है: रचनात्मक (रचनात्मक कार्य): सामाजिक सेवा, साक्षरता अभियान और सामुदायिक परियोजनाएं। आंदोलनात्मक (सकारात्मक संघर्ष): अकादमिक विसंगतियों और राष्ट्रीय मुद्दों के विरुद्ध लोकतांत्रिक व शांतिपूर्ण विरोध। प्रतिनिधित्वपरक (प्रतिनिधित्व): छात्र संघों और विधिक निकायों के माध्यम से विद्यार्थियों की आवाज को प्रभावी ढंग से उठाना। यह संगठन संवेदनशीलता (छात्रों की स्थानीय समस्याओं का समाधान), स्पष्टता (धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित वैचारिक रुख) और दृष्टि (भारत को पुन: 'विश्व गुरु' के रूप में स्थापित करने का संकल्प) के त्रिकोण पर काम करता है। इसके अतिरिक्त, 'वर्ल्ड ऑर्गनाइजेशन ऑफ स्टूडेंट्स एंड यूथ' (WOSY) के माध्यम से पिछले 77 वर्षों में इसने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है और अंतरराष्ट्रीय छात्र समुदाय की सांस्कृतिक व राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया है।
एबीवीपी ने वैश्विक छात्र राजनीति की दो सबसे बड़ी भ्रांतियों को तोड़ा है। पहली भ्रांति यह थी कि छात्रों को केवल 'भविष्य का नागरिक' मानकर नीति-निर्धारण से दूर रखा जाता था। दूसरी भ्रांति यह कि छात्र आंदोलनों को नकारात्मक और उपद्रवी (न्यूसेंस पावर) समझा जाता था। परिषद ने नारा दिया कि छात्र आज के नागरिक हैं और छात्र शक्ति ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है। किंतु यह सदैव दलीय राजनीति से पूर्णतः अलिप्त रहा है। दलीय राजनीति से ऊपर उठने का अर्थ यह कतई नहीं है कि संगठन सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं के प्रति तटस्थ है। संगठन का मानना है कि पूर्णतः सामाजिक गतिविधियां भी राजनीति से अछूती नहीं रह सकतीं, क्योंकि देश के नागरिक होने के नाते छात्र सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के प्रति जवाबदेह हैं। किंतु, एबीवीपी किसी भी राजनीतिक दल की कठपुतली या विंग (प्रकोष्ठ) नहीं है। सत्ता की राजनीति या दलीय हित किसी सामाजिक संगठन का केंद्र बिंदु नहीं हो सकते। आपातकाल का संघर्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के गीतों और सांस्कृतिक चेतना का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में राष्ट्रीय पहचान की खोज तथा औपनिवेशिक दासता से दमित भारतीय संस्कृति को पुनः गौरव दिलाने का एक अनवरत प्रयास है। इतिहास गवाह है कि औपनिवेशिक काल के दौरान भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध संघर्ष, दोनों ही जनमानस द्वारा अपनी खोई हुई राष्ट्रीय पहचान को खोजने की सामूहिक अभिव्यक्ति थे। परिषद के गीत अपने समय की सामाजिक चुनौतियों से गहराई से जुड़े रहे हैं, जिसके कारण यह संगठन केवल एक छात्र संघ न रहकर समय के साथ एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गया। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 'आपातकाल' (1975-77) का दौर सबसे अंधकारमय अध्याय माना जाता है। उस दमनकारी कालखंड में विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने दो मोर्चों पर एक साथ ऐतिहासिक संघर्ष किया: पहला, अपने कार्यकर्ताओं और पूर्णकालिक संगठन मंत्रियों के मनोबल को जीवित रखना; और दूसरा, देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए जनमत को लामबद्ध करना। संगठन इस राष्ट्रव्यापी संघर्ष में 'लोक संघर्ष समिति' के एक अत्यंत सक्रिय अंग के रूप में उभरा। इस दौरान अरुण जेटली जैसे परिषद के कई शीर्ष कार्यकर्ताओं को महीनों जेल की सलाखों के पीछे गुजारने पड़े, वहीं अनगिनत कार्यकर्ताओं ने भूमिगत (अंडरग्राउंड) रहकर दमनकारी नीतियों के खिलाफ अलख जगाए रखी। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष, दोनों ही भारत की 'चिति' (सामूहिक चेतना) को जीवंत रखने के प्रयास थे। वर्ष 1977 में जब इस कठोर और क्रूर तानाशाही युग का अंत हुआ, तब देश के युवाओं ने स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस ली। आपातकाल के बाद के इस दौर में लोकतंत्र के प्रति एक नई उम्मीद जगी और अधिकारों तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पुनर्जीवित हुई। युवा एक बार फिर सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के अपने मूल मिशन में जुट गए। यद्यपि आपातकाल के बाद का राजनीतिक दौर (1977) कुछ हद तक राजनीतिक अस्थिरता से प्रभावित रहा, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा सामाजिक सुधारों और हाशिए के वर्गों के उत्थान के लिए किए गए प्रयास उनकी सरकार के आंतरिक राजनीतिक अंतर्विरोधों के कारण पूरी तरह सफल नहीं हो सके। इस अस्थिर माहौल के बीच भी विद्यार्थी परिषद ने युवाओं का मार्गदर्शन करते हुए उन्हें राष्ट्र निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित किया। संगठन ने समाज में समता (समानता) और बंधुत्व को बढ़ावा देने के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता व्यक्त की। साथ ही, कार्यकर्ताओं को सचेत किया कि वे तात्कालिक या अल्पकालिक लाभ के प्रलोभनों में न आएं, क्योंकि ऐसे लाभों का कोई स्थायी मूल्य नहीं होता। राष्ट्र निर्माण की इस महायात्रा में युवाओं को 'समानता, न्याय और बंधुत्व' के संवैधानिक व शाश्वत आदर्शों के लिए बिना थके निरंतर कार्य करने की आवश्यकता है, ताकि एक सुदृढ़ और समृद्ध भारत का स्वप्न साकार हो सके।
अंततः, विद्यार्थी परिषद की दो अनूठी संरचनात्मक विशेषताएं इसे अन्य संगठनों से भिन्न और स्थायी बनाती हैं। पहली है इसकी 'संगठन मंत्री' (पूर्णकालिक विस्तारक) प्रणाली, जो दलीय छात्र राजनीति के क्षणिक नेतृत्व चक्र के विपरीत संगठन को दीर्घकालिक प्रशासनिक स्थिरता प्रदान करती है। दूसरी विशेषता है 'गुरु-शिष्य' (शिक्षक-छात्र) समन्वय, जो शैक्षणिक परिवार की अवधारणा को जीवंत करता है। शिक्षा व्यवस्था में 'समरसता, समता और अमानता' (सौहार्द, समानता और समत्व) के मूल्यों को समाहित करते हुए यह आंदोलन आज भी राष्ट्र के पुनर्निर्माण और युवाओं के समग्र सशक्तिकरण की दिशा में निरंतर अग्रसर है।
संघ परिवार के अन्य सभी संगठनों की तरह, एबीवीपी (ABVP) के समर्पित कार्यकर्ताओं का दल हमेशा सभी राहत गतिविधियों में सबसे आगे रहता है, और किसी भी प्राकृतिक आपदा के समय तुरंत अपनी सेवाएं देता है। तेजस्वी सूर्या के शब्दों में 'चाहे 1977 में आंध्र प्रदेश में आए चक्रवात के दौरान राहत कार्य में भागीदारी हो, एबीवीपी के कार्यकर्ता सबसे पहले पहुंचने वालों में से होते हैं, जो पीड़ितों की मदद करते हुए दिखाई देते हैं।' शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण के लिए 78 वर्ष से अनवरत संघर्ष करने वाला यह विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन है। आज परिषद के बिना छात्र जीवन लगभग असंभव हो गया है।
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