Jaunpur News : बदहाली पर आंसू बह रहा शेखपुर सतौली का ग्रामीण स्टेडियम



करोड़ों का सरकारी धन खर्च करके बना था स्टेडियम

खुटहन, जौनपुर। विकास की तस्वीर देखने के लिए अगर कोई अधिकारी फाइलों से बाहर निकलकर शेखपुर सुतौली पहुंच जायं तो शायद उसे समझ में आ जाय कि सरकारी योजनाओं की असली हालत कागजों पर कितनी चमकदार और जमीन पर कितनी बदहाल हो सकती है। यहां करोड़ों रुपये की लागत से तैयार ग्रामीण स्टेडियम इन दिनों खिलाड़ियों के पसीने से नहीं, बल्कि घास-फूस और जंगली पौधों से आबाद नजर आ रहा है।

कहा जा रहा है कि जिस स्टेडियम में कभी गांव के युवाओं को दौड़ना, खेलना और कसरत करना था, वहां अब ऐसा नजारा है कि खिलाड़ी तो दूर, आम आदमी भी अंदर जाने से पहले चार बार सोच ले। मैदान में जगह-जगह झाड़ियां और जंगली पौधे उग आए हैं। हालात देखकर ऐसा लगता है जैसे खेल का मैदान धीरे-धीरे चारागाह बनने की तैयारी में हो।

यह स्टेडियम खेल का मैदान है या जंगल सफारी?

स्टेडियम के अंदर की स्थिति सरकारी रख—रखाव व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। ग्राउंड में गिट्टी बिखरी पड़ी होने से दौड़ना और खेलना मुश्किल है। बैडमिंटन और वॉलीबॉल के नेट का भी पता नहीं है। कसरत के लिये लगाये गये उपकरणों में कई टूटे पड़े हैं। मैदान की सफाई और देखरेख का अभाव साफ दिखाई देता है। दिलचस्प बात यह है कि जिस परिसर को युवाओं की खेल प्रतिभा निखारने के लिए बनाया गया, वहां खेल सामग्री से ज्यादा घास-फूस की मौजूदगी दिखाई दे रही है। गार्ड रूम पर ताला लगा है। पेयजल की सुविधा के लिए लगा देशी हैंडपंप भी खराब बताया जा रहा है। यानी स्टेडियम में खेल, व्यायाम और सुविधा—तीनों ही मानो छुट्टी पर चले गये हैं।

स्टेडियम का रख—रखाव कौन करेगा?

ग्रामीण स्टेडियम के निर्माण पर बड़ी धनराशि खर्च की गई लेकिन निर्माण के बाद उसकी देखरेख किस तरह हो रही है, यह तस्वीरें खुद बयां कर रही हैं। सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को खेलों से जोड़ने और गांव-गांव खेल सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात करती है। ऐसे में सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपये खर्च करके स्टेडियम बनाया गया तो उसके रख—रखाव के लिए जिम्मेदार तंत्र कहां है? क्या सरकारी योजना का मतलब सिर्फ निर्माण पूरा होने तक है? क्या उद्घाटन के बाद मैदान की घास खुद कटेगी? क्या टूटे उपकरण अपने आप ठीक होंगे? और क्या खिलाड़ियों को जंगल पार करके स्टेडियम में प्रवेश करना होगा?

खुटहन में योजनाओं की बदहाली पर उठ रहे सवाल

स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि विकास खंड क्षेत्र में कई सरकारी योजनाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। आंगनबाड़ी केंद्र, गौशाला, कूड़ा घर, शौचालय और अब ग्रामीण स्टेडियम की बदहाल तस्वीरों ने विकास व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण है लेकिन शेखपुर सुतौली के स्टेडियम की वर्तमान स्थिति कम से कम इतना सवाल जरूर पूछती है कि जिस विभाग के जिम्मे सरकारी परिसंपत्तियों की देखरेख है, वह आखिर अपनी जिम्मेदारी निभा क्यों नहीं रहा?

अधिकारी कार्यालय में, स्टेडियम जंगल में

व्यंग्य की भाषा में कहें तो खुटहन में विकास का नया मॉडल शायद यही है— अधिकारी कार्यालय में आराम करें और योजनाएं मैदान में घास चरें। जनता को विकास की फाइलें दिखें और जमीन पर झाड़ियां। सरकारी रिकॉर्ड में स्टेडियम चमके और हकीकत में खिलाड़ी रास्ता खोजें। करोड़ों की लागत से मैदान बने और कुछ ही समय बाद वहां प्रकृति अपना कब्जा जमा ले। यह सवाल सिर्फ एक स्टेडियम का नहीं, बल्कि सरकारी धन से तैयार परिसंपत्तियों के रखरखाव और निगरानी की पूरी व्यवस्था का है।

जनता पूछ रही— आखिर जिम्मेदार कौन?

खुटहन क्षेत्र की जनता का सीधा सवाल है कि जब खंड विकास अधिकारी को विकास खंड की योजनाओं और विकास कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है तो शेखपुर सुतौली के इस ग्रामीण स्टेडियम की ऐसी दुर्दशा आखिर क्यों है? क्या किसी अधिकारी ने मौके पर जाकर स्टेडियम का निरीक्षण किया? क्या खराब उपकरणों की मरम्मत के लिए कोई कार्रवाई हुई? क्या मैदान की सफाई के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों या संस्था को निर्देश दिया गया?

सबसे बड़ा सवाल

करोड़ों की सरकारी धनराशि से बनी इस खेल संपत्ति को जंगल बनने से रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? सरकार ने खिलाड़ियों के लिए स्टेडियम बनाया था या जंगली पौधों के लिए नया आशियाना? अब देखना यह है कि इस खबर के बाद जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्टेडियम की सफाई, टूटे उपकरणों की मरम्मत और खेल सुविधाओं को बहाल कराने की पहल करते हैं या फिर यह मैदान इसी तरह सरकारी उपेक्षा की कहानी सुनाता रहेगा?

और नया पुराने

Contact us for News & Advertisement

Profile Picture

Ms. Kshama Singh

Founder / Editor

Mo. 9324074534