देशभर की एफ़आईआर्स ख़त्म- गंभीर पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 चिन्हित व्यक्तियों की व्यक्तिगत भूमिका की अलग जांच!
5 सितंबर 2026 का प्रस्तावित सीजेपी आंदोलन रद्द!
गोंदिया -वैश्विक स्तरपर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 1 सितंबर 2026 का दिन छात्र आंदोलनों, नागरिक स्वतंत्रता और राज्य की जवाबदेही के बीच संतुलन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव के रूप में दर्ज किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 20 से 25 जुलाई 2026 के बीच राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा यानी एनईईटी में कथित अनियमितताओं और प्रश्नपत्र लीक के विरोध में हुए छात्र प्रदर्शनों से संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्टों पर बड़ा आदेश देते हुए कहा कि देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में इन प्रदर्शनों से संबंधित मामलों को आगे अभियोजन या जांच के लिए नहीं चलाया जाएगा और उन्हें सभी उद्देश्यों के लिए बंद माना जाएगा। हालांकि इस व्यापक राहत के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण अपवाद रखा गया है,गंभीर पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 व्यक्तियों के संबंध में अलग कार्रवाई और उनकी व्यक्तिगत भूमिका की जांच का रास्ता खुला रहेगा। इसीलिए इस आदेश को केवल सभी एफआईआर रद्द कहना अधूरा होगा; इसका वास्तविक संदेश है,सामान्य छात्र प्रदर्शनकारियों के लिए व्यापक राहत, लेकिन गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के लिए अलग कानूनी परीक्षण।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा क़ि 31अगस्त 2026 को सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जंतर मंतर आंदोलन से संबंधित एफ़ आई आऱ रद्द करने का का निवेदन फाइल किया था माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इसपर त्वरित1 सितंबर 2026 को सुनवाई का दिन निर्धारित किया था।
साथियों, इस पूरे मामले की कानूनी पृष्ठभूमि शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी बनाम भारत संघ एवं अन्य,आपराधिक रिटयाचिका संख्या 280/2026 से जुड़ी है।इसके साथअन्य संबंधित याचिकाएं भी जुड़ी हुई हैं। 28 जुलाई 2026 को तीन सदस्यीय पीठ,मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना, ने पहली महत्वपूर्ण अंतरिम व्यवस्था की थी। न्यायालय के अभिलेख के अनुसार इन याचिकाओं में जंतर-मंतर, नई दिल्ली तथा देश के अन्य हिस्सों में प्रदर्शनकारियों मुख्यतः छात्रों, के खिलाफ कथित अत्यधिक पुलिस बल के इस्तेमाल,लाठीचार्ज,आंसू गैस, रबर की गोलियों और अन्य कार्रवाई के आरोप उठाए गए थे।दूसरी ओर सरकार की ओर से यह कहा गया था कि प्रदर्शन में कुछ गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले तत्व शामिल होकर हिंसा में लिप्त हुए और पुलिस कर्मियों को भी गंभीर चोटें आईं। यह पूरी जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स क़े आधार पर ली गई है।
साथियों, 28 जुलाई के इसी आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण संतुलन कायम किया था। अदालत ने पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को सीसीटीवी दृश्यांकन, ड्रोन से प्राप्त दृश्यांकन,शरीर पर लगाए गए कैमरों कीरिकॉर्डिंग वीडियो अभिलेख, वायरलेस संचार अभिलेख और पुलिस नियंत्रण कक्ष के अभिलेख सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था।साथ हीप्रदर्शनकारियों की निजी जानकारी और इलेक्ट्रॉनिक आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं करने का आदेश दिया गया। राज्यों और पुलिस को प्राथमिकी की जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ बलपूर्वक या दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया गया। इस सुरक्षा का अपवाद उन व्यक्तियों के लिए रखा गया था जिनकी पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि थी।नाबालिग बच्चों को, यदि वे इस आंदोलन के सिलसिले में हिरासत या गिरफ्तारी में थे और उनके खिलाफ ऐसी गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं थी, तो रिहा करने का भी निर्देश दिया गया था।
साथियों, यहीं से पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि शब्द पूरे मामले का सबसे संवेदनशील कानूनी प्रश्न बन गया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस संदर्भ में पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि का अर्थ किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज हर छोटी-बड़ी प्राथमिकी या मामूली पुराने मामले से नहीं है, बल्कि गंभीर एवं जघन्य अपराधों से है।यह स्पष्टीकरण इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल यह तथ्य कि किसी प्रदर्शनकारी के खिलाफ अतीत में कोई प्राथमिकी दर्ज रही है,उसे स्वतः सर्वोच्च न्यायालय की राहत से बाहर नहीं कर देता।3 अगस्त के स्पष्टीकरण में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दिल्ली और अन्य राज्य कानून के अनुसार विभिन्न प्राथमिकी को बंद या वापस लेने के संबंध में उचित निर्णय ले सकते हैं।
साथियों,1 सितंबर के आदेश का सबसे बड़ा प्रभाव दिल्ली तक सीमित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने 20 से 25 जुलाई के छात्र प्रदर्शनों से संबंधित देशभर की प्राथमिकी को आगे अभियोजन अथवा जांच के लिए नहीं चलाने और उन्हें बंद मानने का निर्देश दिया। इसका अर्थ यह है कि जिस छात्र के खिलाफ केवल इस विशेष आंदोलन में भाग लेने के कारण प्राथमिकी हुई थी और जो गंभीर पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अपवाद में नहीं आता, उसे व्यापक कानूनी राहत मिलेगी। केंद्र सरकार के साथ बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र ने भी संबंधित प्राथमिकी समाप्त करने की मांग की थी। इस प्रकार यह मामला दिल्ली के जंतर-मंतर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर के न्यायिक हस्तक्षेप का रूप ले चुका है।
साथियों,दिल्ली की स्थिति को समझना भी जरूरी है। दिल्ली पुलिस ने 20 से 25 जुलाई के आंदोलन से संबंधित 13 प्राथमिकी को आगे नहीं चलाने की इच्छा सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखी थी। इन प्राथमिकी में दंगा, हत्या के प्रयास, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और अन्य गंभीर आरोप शामिल थे; उपलब्ध समाचार विवरणों के अनुसार इनमें से 10 प्राथमिकी में हत्या के प्रयास से संबंधित आरोप भी थे।पुलिस ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से इन मामलों को समाप्त करने का अनुरोध किया था।लेकिन इसी के साथ उसने 2,873 ऐसे व्यक्तियों के लिए एक अलग और केंद्रित प्राथमिकी की अनुमति मांगी जिन्हें गंभीर पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि वाला बताया गया और जिनकी प्रदर्शन स्थल पर मौजूदगी सटीकता से चिन्हित की गई थी।
साथियों, 2,873 का आंकड़ा इस आदेश की सबसे अधिक चर्चा में रहने वाली बात है, लेकिन इसे समझते समय पत्रकारिता में अत्यधिक सावधानी आवश्यक है। ये 2,873 लोग सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी घोषित नहीं किए गए हैं। उनका अपराध सिद्ध नहीं हुआ है। उपलब्ध विवरण के अनुसार प्रस्तावित अलग प्राथमिकी और जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि इन व्यक्तियों की 20 से 25 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान हिंसा, शारीरिक क्षति या सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में कोई व्यक्तिगत भूमिका थी या नहीं। इसलिए मीडिया में इन्हें सीधे दोषी, अपराधी या हिस्ट्रीशीटर घोषित करना न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा।सही कानूनीभाषा होगी,गंभीर पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 चिन्हित व्यक्तियों की सटिका से व्यक्तिगत भूमिका की अलग जांच।
साथियों,सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भविष्य की प्राथमिकी से जुड़ा है। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने अदालत के सामने यह आश्वासन दिया कि 20 से 25 जुलाई की जिन घटनाओं को वर्तमान आवेदन में शामिल किया गया है, उनके संबंध में आगे कोई नई प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाएगी, सिवाय उस विशिष्ट कार्रवाई के जिसे गंभीर पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 व्यक्तियों के संबंध में अनुमति दी गई है। इस व्यवस्था का सीधा प्रभाव उन सामान्य प्रदर्शनकारियों पर पड़ेगा जिन्हें यह आशंका थी कि आंदोलन समाप्त होने के बाद भी अलग-अलग घटनाओं के नाम पर उनके खिलाफ लगातार नए सटीक आपराधिक मामले दर्ज किए जा सकते हैं।
साथियों इस आदेश को संविधान के अनुच्छेद 142 के व्यापक संदर्भ में भी देखना होगा।अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को किसी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए विशेष शक्ति देता है। इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से इसी संवैधानिक शक्ति का सहारा लेकर प्राथमिकी समाप्त करने का अनुरोध किया गया था। न्यायालय का दृष्टिकोण केवल तत्काल आपराधिक मामलों को समाप्त करना नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य पर उन मामलों के दीर्घकालिक प्रभाव को ध्यान में रखना भी रहा। अदालत ने छात्रों और युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इस असाधारण संवैधानिक शक्ति के प्रयोग को उचित माना।हालांकि प्राथमिकी समाप्त होने का अर्थ यह नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रत्येक प्रदर्शनकारी को तथ्यात्मक रूप से निर्दोष घोषित कर दिया है। प्राथमिकी निरस्त होने का कानूनी परिणाम यह है कि संबंधित आपराधिक प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा; यह किसी व्यक्ति के आचरण पर सामान्य आपराधिक न्यायालय में दोषसिद्धि या बरी होने जैसा तथ्यात्मक निर्णय नहीं है।इसलिए इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय ने सभी छात्रों को निर्दोष घोषित किया के बजाय सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलन से संबंधित प्राथमिकी समाप्त कर छात्रों को बड़ी कानूनी राहत दी कहना अधिक बहुत सटीक होग़ा।
साथियों, इस पूरे घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चस्तरीय जांच समिति भी महत्वपूर्ण है। 18 अगस्त के न्यायालयीन अभिलेख में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों दोनों पक्षों से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति की व्यवस्था की गई थी। समिति को प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस पर लगाए गए अत्यधिक बल के आरोपों के साथ-साथ पुलिस कर्मियों पर प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान और पुलिस बल को हुई चोटों की भी जांच करनी है। अदालत ने सीसीटीवी, ड्रोन दृश्यांकन, शरीर पर लगाए गए कैमरों की रिकॉर्डिंग और अन्य अभिलेख सुरक्षित रखने के निर्देशों को भी जारी रखा। इस प्रकार प्राथमिकी का बंद होना पुलिस कार्रवाई या आंदोलन के दौरान हुई हिंसा से जुड़े व्यापक तथ्यात्मक प्रश्नों की जांच को सटीकता से समाप्त नहीं करता।
साथियों, इस आदेश का राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी व्यापक है। 20 जुलाई से शुरू हुआ आंदोलन 25 जुलाई को समाप्त हुआ था और प्राथमिकी वापस लेना प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में शामिल था। 1 सितंबर की सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही के बाद प्रदर्शनकारी संगठन की ओर से प्रस्तावित 5 सितंबर का मार्च वापस लेने की घोषणा की गई। इससे संकेत मिलता है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप केवल अदालत और पुलिस के बीच कानूनी विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने आंदोलन और सरकार के बीच बने गतिरोध को भी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साथियों,इस पूरे मामले में महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। इन राज्यों ने संबंधित प्राथमिकी को समाप्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। उपलब्ध विवरण के अनुसार बिहार ने 69, महाराष्ट्र ने 34 और असम ने 5 प्राथमिकी की सूची अदालत के सामने रखी। इससे यह मामला वास्तव में जंतर-मंतर की प्राथमिकी से बढ़कर देशव्यापी छात्र आंदोलन की प्राथमिकी का मामला बन गया है। यही कारण है कि 1 सितंबर का आदेश केवल राजधानी में बैठे छात्रों के लिए राहत नहीं, बल्कि विभिन्न राज्यों में इसी आंदोलन के कारण कानूनी कार्रवाई झेल रहे प्रदर्शनकारियों के लिए भी अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
*-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*