Mumbai News : के. सी. महाविद्यालय में ‘दिनकर के खंडकाव्य’ पर संगोष्ठी


दिनकर को वर्तमान से जोड़कर देखने की जरूरत : प्रो. दुबे
मुंबई। महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी एवं के. सी. महाविद्यालय के हिन्दी-विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत शनिवार को “राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के खंडकाव्य” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में महाविद्यालय की प्रभारी प्राचार्य प्रो. (डॉ.) तेजश्री शानभाग स्वागताध्यक्ष के रूप में उपस्थित रहीं। प्रो. (डॉ.) शीतला प्रसाद दुबे ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। बीज वक्तव्य में प्रो. शीतला प्रसाद दुबे ने साहित्य और राजनीति के संबंध को रेखांकित करते हुए ‘दिनकर’ का उल्लेख करते हुए कहा कि “जब-जब राजनीति लड़खड़ाती है, तब-तब साहित्य इसे संभालता है।” उन्होंने कहा कि साहित्य को वर्तमान परिस्थितियों से जोड़कर देखने की आवश्यकता है और आज की सामाजिक एवं राजनीतिक चुनौतियों को समझने के लिए दिनकर के साहित्य का अध्ययन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनके अनुसार दिनकर केवल अतीत के राष्ट्रकवि नहीं हैं, बल्कि उनका साहित्य वर्तमान की समस्याओं और चुनौतियों से भी संवाद करता है। संगोष्ठी का संयोजन हिन्दी-विभाग अध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार राय ने किया।

‘साहित्य’ वर्तमान के यथार्थ को सामने लाने का माध्यम
डॉ. दुबे ने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ और उसकी समस्याओं को सामने लाने का माध्यम है। दिनकर के काव्य में विचार और संघर्ष के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन तथा मानवीय मूल्यों की चिंता भी दिखाई देती है। उन्होंने दिनकर के साहित्य में शास्त्र और शस्त्र के अंतर्संबंध तथा महाभारत के संदर्भ में धर्म और अर्थ के संबंध पर भी विचार रखा। उन्होंने कहा कि अर्थ-व्यवस्था का आधार धर्म और लोककल्याण होना चाहिए।

‘दिनकर’ राष्ट्रगौरव एवं राष्ट्रीय चेतना के कवि
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि भारतीय निर्यात-आयात बैंक के महाप्रबंधक एवं राजभाषा प्रमुख नवेंदु वाजपेयी ने दिनकर को राष्ट्रगौरव एवं राष्ट्रीय चेतना का कवि बताते हुए कहा कि उनके काव्य में संघर्ष, स्वाभिमान और राष्ट्रीय भावना की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। उन्होंने दिनकर की प्रसिद्ध पंक्ति “याचना नहीं, अब रण होगा” का उल्लेख करते हुए उनके काव्य में निहित संघर्ष चेतना को रेखांकित किया। उन्होंने ‘रश्मिरथी’ के केंद्रीय पात्र कर्ण के माध्यम से जाति-व्यवस्था, सामाजिक भेदभाव, आत्मसम्मान और कर्म की महत्ता जैसे प्रश्नों की चर्चा की।

विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने रखे विचार
संगोष्ठी सत्रों की अध्यक्षता प्रो. शीतला प्रसाद दुबे, डॉ. सतीश पांडेय एवं डॉ. संतोष कौल ने की। वहीं मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. मृगेंद्र राय, डॉ. उषा मिश्र एवं डाॅ. प्रवीणचंद्र बिष्ट की उपस्थिति रही। इस अवसर पर डॉ. मनीष मिश्रा, डॉ. उषा दुबे, डॉ. अनंत द्विवेदी, अंजना विजन, डॉ. वैशाली पाचुंदे, मांगीलाल बिश्नोई, दुर्गा विश्वकर्मा एवं किरण गोस्वामी गरिमा सिंह, अलका ओझा, विषय विशेषज्ञ के रूप में दिनकर के खंडकाव्य पर अपने विचार प्रस्तुत किए। सत्रों का संचालन क्रमश: डॉ. अजीत कुमार राय, प्राध्यापक सुनिता चौहान, डॉ. प्रशांत देशपांडे ने तथा आभार ज्ञापन मैत्री शाह ने किया। संगोष्ठी के सफल आयोजन में प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय भूमिका निभाई। संगोष्ठी में प्रस्तुत विभिन्न शोधपरक वक्तव्यों के माध्यम से यह निष्कर्ष सामने आया कि दिनकर के खंडकाव्य केवल इतिहास और मिथक का पुनर्पाठ नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय चेतना, मानवीय गरिमा, नैतिकता, युद्ध और शांति जैसे समकालीन प्रश्नों से भी गहरा संवाद स्थापित करते हैं।
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