- सेवानिवृत्त शिक्षक नेताओं की इस बार नहीं चलेगी जुगलबंदी
- नौजवान शिक्षकों ने इस बार परिवर्तन करने का बना चुके है मन
हिम्मत बहादुर सिंह
जौनपुर।
शिक्षकों के साथ अब छलावा नहीं चलेगा। शिक्षक अब जागरूक हो गए है। इस बार के शिक्षक विधायक चुनाव में कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। रही बात वित्तविहीन शिक्षकों की तो उन्हें वियनिमित कराने के नाम पर सिर्फ बयानबाजी रही। इस बार के चुनाव में शिक्षकों ने उन्हीं संघर्षशील शिक्षक को सदन में भेजने का मन बना लिए जो उनकी मांगों को सड़क से सदन तक लड़ने के लिए तैयार रहे। मौजूदा शिक्षक संगठनों के जिम्मेदार लोगों का शिक्षकों के हितों से कोई सरोकार नजर नहीं आ रहा है। ऐसे जो दावेदार इस बार भी चुनाव मैदान में उतर रहे हैं ऐसे संगठनों के जिम्मेदार लोगों छह साल का लेखा जोखा भी शिक्षक मांगने से नहीं चूक रहे है। फिलहाल इस बार शिक्षक विधायक का चुनाव काफी दिलचस्प होगा। नौजवान शिक्षकों ने इस बार परिवर्तन करने का मन बना चुके हैं।
बताते चलें कि लगभग दो दशक से शिक्षकों के हितों की लड़ाई लड़ रहे एमएलसी प्रत्याशी अपने संघर्ष की बदौलत अपनी राजनीतिक जमीन तैयार किए और शिक्षकों के कहने पर इस बार चुनाव मैदान में उतरने का मन बनाया। हमेशा उन्होंने शिक्षक हितों को सर्वोपरि माना और उनको न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करते रहे। शिक्षक संगठनों द्वारा हासिल की गई उपलब्धियां एक-एक करके छीनी जा रही है और संगठन की बदौलत राजनीति करने वाले शिक्षक नेता सिर्फ बयानबाजी करके राजनीति करने में मशगुल दिख रहे है। हालांकि इस बार दावेदारों की संख्या भी अच्छी खासी है लेकिन मुख्य मुकाबला कुछ लोगों के बीच ही है। यह तो तय है कि सेवानिवृत्त शिक्षकों के हाथों में इस बार बागडोर देने के पक्ष में नौजवान शिक्षक नजर नहीं आ रहे हैं। अब देखना है कि छह साल तक सदन में शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने का मौका किस दावेदार को मिलता है।
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