आंदोलन के नाम पर देश से धोखा? | #NayaSaberaNetwork

नया सबेरा नेटवर्क
हिंसा में शामिल होने से किसान आंदोलन का नैतिक पतन हो चुका है। फ़र्ज़ कीजिये अगर आज महात्मा गांधी, सरदार पटेल, शहीद भगत सिंह या लाल बहादुर शास्त्री जी किसानों की हिंसक हुड़दंग देखते तो क्या सोचते? 1919 में संविनय अवज्ञा आंदोलन हुआ, स्वदेशी आंदोलन हुआ, हज़ारों लाखों लोग अपनी ,पढ़ाई, कमाई, पेशा , व्यापार सब छोड़ कर इंसमें शामिल हुए। लेकिन गांधी जी की शर्त थी कि आंदोलन पूरी तरह अंहिसात्मक ही रहेगा। जैसे ही असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था, इसी समय 5 फरवरी 1922 को 21 पुलिस वालों को थाने में बंद करके जिंदा जला दिया, गांधी जी ने एक झटके में आंदोलन वापस ले लिया। क्या किसान यूनियन जी 31 तारीख को उपवास का नाटक करने जा रहे हैं, उनमें है इतना नैतिक बल? क्या वे आगे आकर अपनी गलतियों को स्वीकार करके देश से माफी मांगेंगे और आंदोलन को तत्काल प्रभाव से वापस लेंगें? 
एक इच्छा थी कि किसानों की ट्रैक्टर रैली आदर्श स्थापित करेगी। कल्पना ये थी कि, कितना सुखद होगा इस बार का गणतंत्र दिवस। जब इस देश के जवान और किसान एक साथ दिल्ली में उत्सव मनाएंगे। भले ही किसान संगठनों ने इस बार ट्रैक्टर परेड की अनुमति नाराजगी के माहौल में मांगी है, लेकिन इस देश के किसान कभी भी अपने गौरवशाली गणतंत्र दिवस को पूरी दुनिया के सामने मखौल नहीं उड़ायेंगे। लेकिन किसान आंदोलन ने सारी दुनिया के सामने हमारी शक्ति प्रदर्शन वाले दिन ही, देश को कमजोर दिखा दिया।  सरकार से मतभेद लोकतंत्र की नींव का प्रमुख पत्थर है। लेकिन देश से किसी को मतभेद या मनभेद नहीं दिखाना चाहिए, जिसका अनुचित लाभ देश विरोधी ताकतों या दुश्मन देश उठा सकें। लेकिन जिस तरह लाल किले के सामने किसानों ने वहशीपन दिखाया, उससे पाकिस्तान, चीन सहित देश के सभी दुश्मन खूब खुश हुए होंगे। कैसे हमारे देश के किसानों ने  देश के खून का रंग कभी फीका साबित करने की कोशिश की है। जो भी विरोध या मतभेद हैं, वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, उसे इसी मार्ग से हल किया जाना है। लेकिन इससे सिद्ध होता है, किसानों ने 'मुंह में राम और बगल में छुरी' लेकर सरकार और पुलिस को धोखा दिए।
26 जनवरी को दिल्ली में जो कुछ भी हुआ, उसने किसानों की 62 दिनों की तपस्या की खंडित कर दिया। जनता से उन्हें जो सुहानुभूति, समर्थन और नैतिक बल एक शांत और अहिंसक आंदोलन से हासिल हुआ था, उसे 26 जनवरी की अराजकता और हिंसा ने छिन्न भिन्न करके रख दिया। ट्रैक्टर रैली के दिखावे के चक्कर मे, अपने असली मुद्दे से सारा आंदोलन भटक गया है। अब सिर्फ पुलिस जांच, आरोप प्रत्यारोप, एक दूसरे पर कीचड़ उछालने में ही सभी जा ध्यान लग जायेगा। सबसे बड़ी बात जो हुई, वह है किसान आंदोलन में कुछ ऐसे लोग छुपे हुए थे, जिनका इस आंदोलन से कोई मतलब नहीं था, बल्कि वे देश के सम्मान और कानून से खिलवाड़ करना चाहते थे। शायद इसीलिए 11 राउंड की बात करके भी सरकार के हर प्रस्ताव को ये लोग चालाकी से खारिज करते रहे। 
'जय जवान, जय किसान' का नारा शास्त्री जी ने पाकिस्तान से युद्ध की पृष्ठभूमि में देश के जवानों का मनोबल बढ़ाने और अन्न की कमी से जूझते देश के लिए अधिक अन्न उपजाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए दिया था। संवैधानिक गणतंत्र बनने के 70 सालों में आज भारत पूरे विश्व में एक महान सैनिक सत्ता के साथ ही, खाद्यान्न सहित अन्य मामलों में भी एक आत्मनिर्भर देश बन चुका है। इसीलिए मोदी सरकार ने किसानों के साथ वार्ता के मार्ग पहले दिन से खुले रखे हैं। 11 दौर की वार्ता में उन्हें बड़े धैर्य और सम्मान से सुना गया है। 
कृषि कानूनों पर देश भर में बहस जारी है। उतनी ही तल्ख राजनीति भी। लेकिन 70 साल बाद भी यदि अधिकांश कृषि आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था में यदि किसानों की हालत बदहाल है तो निश्चित ही समाज, सरकार और संविधान के समक्ष एक चुनौती है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनौतियों का सामना, हिंसा, बलजबरी या हठ से नहीं किया जाता। भूमि राज्यों की सूची और कृषि समवर्ती सूची का विषय है। क्या राज्यों ने किसानों के प्रति अपनी भूमिका का निर्वहन ईमानदारी से किया?  इसके लिए संवाद, समझ और सामंजस्य की जरूरत होती है। यकीन मानिए सरकार जितनी सकारात्मक है, किसान संगठन या आढ़तिये जिन्हें किसानों का सही शोषक माना जाना चाहिए, उतने ही नकारात्मक है। आखिर  क्यों किसान राज्यों के खिलाफ आंदोलन नहीं कर रहे? क्या इंसमें सिर्फ मोदी और भाजपा विरोधी एकतरफा नज़रिया नहीं दिखता?
बस जरूरत है, तो एकतरफा भावनात्मक नजरिया न रखते हुए, कॄषि कानून को सम्यक दृष्टि और देश के भविष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार के प्रयासों का साथ देने की। बस जल्दबाजी में, बहकावे में या आवेश में आकर इस हठधर्मिता को त्यागें और बिना किसी पूर्वाग्रह के सरकार को किसानों के हित में अपने किये गए वायदे को पूरा करने का अवसर दें। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कुछ प्रश्न खड़े होते हैं, जिनका उत्तर कृषि सुधार के हर समर्थक या विरोधी को देना ही होगा। आखिर किसान की आय कैसे दुगनी होगी? क्या बिना पूंजी के किसान की आर्थिक स्थिति बदलेगी? क्या बिना कुछ नया प्रयोग किये, पुरानी स्थिति बदली जा सकती है? क्या डॉ कलाम का गांव के विकास का मॉडल PURA (providing Urban Amenities in Rural Areas) पूरा हो सकता है? इसी स्वप्न को पूरा करने के लिए सारे देश ने नरेंद्र मोदी की सरकार को प्रचंड बहुमत दो दो बार दिया। क्या 135 करोड़ की आबादी के जनमत का सम्मान खतरे में नहीं है? विपक्षी दल जनता का भरोसा खो चुके हैं। उसे वापस पाने के लिए वे उनके बीच जाकर जमीन पर काम करना होगा। लेकिन दशकों से सत्ता सुख भोग रहे नेता मेहनत करने के बजाय भोले भाले किसानों के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में लगे हैं।  याद रहे जिहोंने जनमत का सम्मान नहीं किया जनता ने उन्हें हमेशा के लिए राजनीतिक रसातल में पहुँचाया है। 
ध्यान रहे हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, बैंक राष्ट्रीकरण के समय भी लोगों ने समाज को भड़काने का काम किया था। लेकिन उसका सुखद परिणाम 20 सालों के बाद दिखा। इसी तरह 1991 में हुए आर्थिक उदारीकरण का विरोध किया गया, आज उसका लाभ सभी को निरुत्तर करता है। इसी तरह जब SEZ (Special Economic Zone) की नीति आयी तो देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि सभी की जमीनें उद्योजगत हड़प लेगा। क्या हुआ ऐसा आजतक? नहीं। उल्टे इसका लाभ मझोले और बड़े किसानों को हुआ। इसी तरह वर्तमान कृषि कानून भी किसानों की चिंताओं को दूर करते हुए लागू किया जाना चाहिए। फिर आने वाले 10 सालों में इसके प्रभाव और परिणाम की समीक्षा करके, आगे और भी सुधार या जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं। सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना, किसी भी पक्ष को उपहास का पात्र बना देगा। अतः खुले मन से किसान अपने देश के गणतंत्र को याशश्वी और महान बनाएं। जय जवान, जय किसान के पवित्र घोष को कलंकित न होने दें। 
डॉ रवि रमेशचंद्र
प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र, मुम्बई

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