डा. राम सिंगार शुक्ल 'गदेला' @ जौनपुर। जनपद में नीलगायों, घड़रोच जैसे जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक ने खेती-किसानी की परंपरागत व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। हालत यह है कि किसान अब गन्ने जैसी लाभकारी फसल से तौबा कर चुके हैं। कभी दिसंबर और जनवरी के महीनों में गांव-गांव से गुड़ पकने की सोंधी खुशबू आती थी लेकिन आज जौनपुर में गुड़ का उत्पादन ना के बराबर रह गया है। गन्ने की खेती छोड़ने के कारण किसानों की आय पर भी सीधा असर पड़ा है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती जा रही है।
एक समय था जब जौनपुर का गुड़ दूर-दूर तक मशहूर था। किसान सुबह-सुबह गन्ने की कटाई करते थे और बैलों से चलने वाले कोल्हुओं के माध्यम से गन्ने का रस निकालकर गुड़ और शक्कर तैयार करते थे। इससे उन्हें अच्छी आमदनी होती थी। नगर क्षेत्र में इसके लिए बाकायदा बाजार भी थे जिन्हें शक्कर मंडी और खंड की मंडी के नाम से जाना जाता था। इन मंडियों में गुड़ की खरीद-फरोख्त के लिए दूर-दराज से व्यापारी आते थे। आज वही मंडियां सूनी पड़ी हैं और कारोबार लगभग समाप्त हो चुका है।
नीलगायों के आतंक का असर केवल गन्ने तक सीमित नहीं रहा। जनपद का मशहूर जमैथा का खरबूजा, जो कभी जौनपुर की पहचान हुआ करता था, अब इतिहास बनता जा रहा है। नीलगायों द्वारा फसलों को भारी नुकसान पहुंचाए जाने से किसानों ने खरबूजे की खेती भी लगभग बंद कर दी है। इसी तरह अरहर जैसी दलहन फसल की बुवाई भी अब बहुत कम हो गई है। किसान अरहर उगाने के बजाय बाजार से दाल खरीदना ज्यादा सुरक्षित और आसान समझने लगे हैं।
गौराबादशाहपुर क्षेत्र में कभी गुड़ की एक बड़ी मंडी लगती थी जहां स्थानीय उत्पादकों का गुड़ बिकता था। आज यह मंडी भी समाप्ति की कगार पर है। जो किसान कभी गुड़ के बड़े उत्पादक थे, वे अब अपनी घरेलू जरूरत के लिए भी बाजार पर निर्भर हो गए हैं। इससे स्पष्ट है कि जंगली जानवरों के आतंक ने न केवल खेती को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि जौनपुर की परंपरागत पहचान और ग्रामीण संस्कृति को भी गहरा आघात पहुंचाया है। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जनपद की खेती और भी संकट में पड़ सकती है।
एक समय था जब जौनपुर का गुड़ दूर-दूर तक मशहूर था। किसान सुबह-सुबह गन्ने की कटाई करते थे और बैलों से चलने वाले कोल्हुओं के माध्यम से गन्ने का रस निकालकर गुड़ और शक्कर तैयार करते थे। इससे उन्हें अच्छी आमदनी होती थी। नगर क्षेत्र में इसके लिए बाकायदा बाजार भी थे जिन्हें शक्कर मंडी और खंड की मंडी के नाम से जाना जाता था। इन मंडियों में गुड़ की खरीद-फरोख्त के लिए दूर-दराज से व्यापारी आते थे। आज वही मंडियां सूनी पड़ी हैं और कारोबार लगभग समाप्त हो चुका है।
नीलगायों के आतंक का असर केवल गन्ने तक सीमित नहीं रहा। जनपद का मशहूर जमैथा का खरबूजा, जो कभी जौनपुर की पहचान हुआ करता था, अब इतिहास बनता जा रहा है। नीलगायों द्वारा फसलों को भारी नुकसान पहुंचाए जाने से किसानों ने खरबूजे की खेती भी लगभग बंद कर दी है। इसी तरह अरहर जैसी दलहन फसल की बुवाई भी अब बहुत कम हो गई है। किसान अरहर उगाने के बजाय बाजार से दाल खरीदना ज्यादा सुरक्षित और आसान समझने लगे हैं।
गौराबादशाहपुर क्षेत्र में कभी गुड़ की एक बड़ी मंडी लगती थी जहां स्थानीय उत्पादकों का गुड़ बिकता था। आज यह मंडी भी समाप्ति की कगार पर है। जो किसान कभी गुड़ के बड़े उत्पादक थे, वे अब अपनी घरेलू जरूरत के लिए भी बाजार पर निर्भर हो गए हैं। इससे स्पष्ट है कि जंगली जानवरों के आतंक ने न केवल खेती को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि जौनपुर की परंपरागत पहचान और ग्रामीण संस्कृति को भी गहरा आघात पहुंचाया है। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में जनपद की खेती और भी संकट में पड़ सकती है।
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