जौनपुर। यूजीसी जैसे काले कानून, जातीय विभेद पैदा करने वाले कानून, मां सरस्वती के प्रांगण महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं के बीच में वैमनस्यता की खाई बनाने वाले कानून देश में मान्य नहीं है। उक्त बातें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दू परिषद के प्रांत महामंत्री तरुण शुक्ल ने कही। साथ ही आगे कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के इस देश में ऊंच-नीच, अगड़ा-पिछड़ा, फॉरवर्ड-बैकवर्ड, दलित-सवर्ण, अनुसूचित जाति, जनजाति जैसे शब्दों का प्रयोग नेता अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए करते हैं। समाज को जातीय हिंसा की आग में झोंककर वोट बैंक की जुगत बनाते हैं। यह सभी मात्र साधारण शब्द नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेताओं द्वारा चलाये जाने वाले विध्वंसक हथियार है। इसी में से एक हथियार केंद्र की सत्ताधारी सरकार ने चलाया और हिंदू संगठन व आरएसएस के विगत 100 वर्षों से चलाए जा रहे हिंदू एकता और शकल हिंदू सम्मेलनों को ताख पर रखकर हिंदुओं के बीच नफरत की खाई बनाने का काम किया है।
उन्होंने कहा कि कानून की नजर में आला और अदना बराबर होता है। देश के अंदर एक समान आचार नागरिक संहिता की आवश्यकता है। न कि जातीय विभेद पैदा करने वाले कानून की। इस विषय पर मौन रहकर अपनी स्वीकृति देने वाले नेता अपनी आने वाली पीढियां के ऊपर होने वाले जुल्म और शोषण के जिम्मेदार होंगे। वैसे तो काले कानून के विरुद्ध देश के अनेक हिस्सों से विरोध के स्वर मुखर हो रहे हैं तथा इस काले कानून का विरोध करने वालों की गिरफ्तारियां व उन्हें नजर बंद करने का काम भी सरकार की हताशा का परिणाम है जो सामने दिखाई दे रहे हैं। मैं किसी जातिवादी व्यवस्था का समर्थक नहीं हूं किंतु जातीय विभेद पैदा करके लोगों को संघर्ष की आग में झोंकने वाले कानून का भी मैं समर्थन नहीं करता हूं। समाज के विभिन्न आयु वर्ग के तथा विभिन्न जाति वर्ग के बुद्धिजीवी समाज को आगे आना चाहिए तथा इसका पूरजोर विरोध करना चाहिए। देश के अंदर एक समान आचार नागरिक संहिता लागू हो यह अति आवश्यक है।
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