जिस तरह की घटनाएं आजकल भारत देश में हो रही हैं।वह बेहद चिंतनीय हैं। संविधान सबको जीने खाने रहने का मौलिक अधिकार देता है।मगर लगता नहीं कि वह अधिकार शरीफ और सज्जन लोगों को है।जिस तरह के आये दिन समाचार देखने सुनने पढ़ने को मिल रहे हैं।उससे तो नहीं लगता कि शरीफ और सरल सभ्य लोगों को सुचारु रूप से जीने यात्रा करने और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने का अधिकार है।ऐसी ऐसी हृदयविदारक घटनाएं घटित हो रही हैं कि शब्द नहीं मिल रहे कि क्या कहूॅं। कहीं सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं। कहीं सामूहिक बलात्कार के साथ निर्दयता की सारी हदें तोड़ दी जा रही हैं। कहीं तीन तीन साल की बच्चियों के साथ आये दिन बलात्कार और हत्या की खबरें अखबार और टीवी की सुर्खियां बनी हुई हैं।छी: घिन आती है ऐसे विद्रुप समाज को देखकर।बड़े मजे की बात ए है कि ऐसे अपराधियों को बचाने के लिए बड़े बड़े वकील मुकदमा लड़ते हैं।समाज के रसूखदार लोग भी अपने रसूख का उपयोग करते हैं।हर सम्भव प्रयास करते हैं।इसीलिए शायद अपराधी बेखौफ हैं।
घटनाएं तो आजाद भारत में नित नई हो ही रही हैं।कई राज्य ऐसे हैं जहाॅं किसी की हत्या कर देना,किसी महिला के साथ बलात्कार कर देना जैसे ओलम्पिक का खेल हो।कानून जैसे उनकी रखैल हो।है भी तभी तो बेखौफ अपराध पर अपराध हो रहे हैं।अपराधी लोग कानून को जैसे जेब में असलहा लेकर चलते हैं,वैसे ही कानून को भी लेकर घूम रहे हैं।एक जेब में कानून दूसरे में असलहा।यदि ऐसा न होता तो दिनांक २२+जून २०२६ दिन मंगलवार की रात लगभग दस बजे के आस पास मुम्बई की लोकल में थोड़ी सी कहासुनी में युवक की जान नहीं जाती।लोहार परिवार पर बज्रपात नहीं होता। सार्वजनिक परिवहन में अपराधी बिंदास चाकू लेकर यात्रा कर रहा है।और सह यात्रियों की जान भी ले रहा है।यह घटना भय का माहौल पैदा कर रही है। उपरोक्त घटना की जो विडियो देखने को मिली
उसमें अपराधी इतना बेखौफ नजर आ रहा है।जैसे उसने कुछ किया ही न हो।या किसी की जान लेना उसके लिए मामूली बात हो।कोई खेल हो।उसकी चाल ढाल को देखकर ऐसा नहीं लगता कि उसे कानून का प्रशासन का कोई भय है।ऐसा इसलिए है प्रशासन से कहीं न कहीं चूक जरूर हो रही है।जिससे अपराधी प्रवृत्ति लोगों में बढ़ रही है।अकेले विरार नगरपालिका में विगत कई दिनों से लाशों का मिलना अनवरत जारी है।आये दिन कहीं शिर कटी लाश कहीं नग्न लाश मिल रही है।अपराधी नहीं मिल रहे हैं।किसी तरह मिल भी जा रहे हैं तो उनके ऊपर विधिपूर्वक कार्यवाही नहीं हो रही है।कोई न कोई रसूखदार बचाने आ जाता है।जिसका परिणाम यह है कि अपराधी कहीं भी कभी भी हृदयविदारक घटनाएं अंजाम दे रहे हैं।जैसे कि मंगलवार दिनांक २२ जून २०२६ को एक युवक को मामूली बात में अपनी जिन्दगी गंवानी पड़ी।जिस व्यक्ति ने उस बच्चे की जान ली है।वह अपराधी प्रवृत्ति का है।यदि अपराधी प्रवृत्ति का नहीं होता तो सार्वजनिक परिवहन में या यूॅं कहें कि सदैव प्राणघातक हथियार लिए नहीं घूमता। प्रशासन को चाहिए कि ऐसे व्यक्ति को पकड़कर चौराहे पर खड़ा करके कच्ची मौत देनी चाहिए।जिसे देखकर अन्य अपराधी अपराध छोड़ दे।और जो अपराधी बनने का सोच रहा हो,वो अपराधी बनने का सपना छोड़ दे।और अदालत को भी चाहिए कि सबूत के तौर जो विडियो उपलब्ध हो उसपर स्वस्फूर्त संज्ञान लेकर ऐसे अपराधियों पर त्वरित कार्रवाई करते हुए कच्ची फाॅंसी का प्रावधान करे।जिससे अपराधी चाहे प्रशासनिक अधिकारी हो या आम,सबमें कानून का भय पैदा हो।
पुनः भारत भूषण तिवारी जैसे युवकों के साथ पुलिस बर्बर न बन सके।न मयंक लोहार जैसे बच्चे थोड़ी सी कहासुनी में अपनी जान गंवा सके।न बेगूसराय जैसी महिला के साथ दुर्दांत व्यवहार हो सके।पता नहीं क्यों नित नये अपराधी कहाॅं से प्रगट हो रहे हैं।जबकी बहुत से दुर्दांत अपराधी मारे गये हैं।क्या आधुनिक शिक्षा का असर है।या राजनीतिक कुरीति।जो विधान को अपने हिसाब से चलाना चाहती है।हम जब दोनों विषयों पर गौर करते हैं तो दोनों ही जवाबदार दिखते हैं। क्योंकि आधुनिक शिक्षा से संस्कार गायब।बच्चों में किसी का भय नहीं है।न शिक्षक का न अभिभावक का। इसलिए बच्चे अपराध की तरफ उन्मुख हो रहे हैं। राजनीति उन्हें संरक्षण दे रही है। इसलिए भी आपराधिक प्रवृत्ति युवाओं में बढ़ रही है।कुछ हद तक हमारा संविधान भी दोषी है।जिसका फायदा अपराधियों को मिलता है।जिससे अपराधी बेखौफ अपराध कर रहे हैं।नित नये अपराधी निकल रहे हैं। इंजिनियर,डॉ,सैनिक कम निकल रहे हैं। अपराधी अधिक निकल रहे हैं।इसे रोकने में परिवार समाज विद्यालय प्रशासन सब असफल हैं।
प्रशासन को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।ऐसा क्या करे,जिससे अपराध कम से कम हो।आम आदमी सकून से जी खा टहल सके।थोड़ी सी तूं तूं मैं मैं में किसी को अपनी जान न गंवानी पड़े।अपराध जगत में प्रशासन का भय हो। अपराधी अपराध करने से पहले कम से कम परिणाम के बारे में सौ बार अवश्य सोंचे। अपराधियों के हिय में कानून की धमक होनी चाहिए। गोस्वामी जी ने एक जगह लिखा है कि,सठ सुधरहिं सतसंगति पाये।ए बात सतयुग त्रेता द्वापर में लागू होती थी। इसलिए कलयुग के हिसाब से वही गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं।भय बिनु होइ न प्रीति।तो आज की तारीख में जब लोगों में प्रशासन का भय होगा तभी अपराध कम होगा।वर्ना ऐसे ही बेखौफ अपराधी आमजन की जिन्दगी से खिलवाड़ करते रहेंगे।
पं.जमदग्निपुरी
