मुंबई। हिंदी प्रचार एवं शोध संस्था, मुंबई द्वारा 261वीं मासिक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन न्यू सी व्यू, न्यू रविराज कॉम्प्लेक्स, जेसल पार्क, भाईंदर (पूर्व) में संपन्न हुआ।गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुधाकर मिश्र ने की। मुख्य अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. कृपाशंकर मिश्र तथा विशिष्ट अतिथि एवं संयोग साहित्य पत्रिका के संपादक मुरलीधर पाण्डेय उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन संस्था के महासचिव डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल ने किया।अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सुधाकर मिश्र ने सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए साहित्य की सामाजिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपना गीत सुनाते हुए कहा कि "आ रहे दिन त्रासदी के, छा रहा थक्का अंधेरा, सत्य भाषिक धूप-सी मोहक…"। उनके गीत ने वर्तमान समय की विसंगतियों के बीच सत्य और आशा का संदेश दिया।मुख्य अतिथि डॉ. कृपाशंकर मिश्र ने अपने गीतों के माध्यम से ग्राम्य जीवन की स्मृतियों को जीवंत करते हुए कहा— "आइए गाँव की बातें करते हैं", "शहर का हो के भी शहर का हो नहीं पाया", "चलो हम ढूँढ़ लाएँ फिर उस गुज़रे ज़माने को।" उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावुक कर दिया।विशिष्ट अतिथि मुरलीधर पाण्डेय ने अपनी संवेदनशील रचना "ये ज़िंदगी कुछ बोलती नहीं" का पाठ कर जीवन के मौन सत्य को अभिव्यक्ति दी। प्रख्यात ग़ज़लकार डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल ने अपनी सशक्त ग़ज़लों से खूब वाहवाही बटोरी। उन्होंने पढ़ा "चिता की आग में जलते हुए मंजर देखे, हमने मिट्टी के खुदाओं के मुकद्दर देखे।" एक अन्य शेर में उन्होंने सामाजिक मूल्यों की रक्षा का संदेश देते हुए कहा "ज़मीर बेचकर दुकान-मकान मत करना, तुम दागदार अपना खानदान मत करना।" वहीं उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर कटाक्ष करते हुए कहा— "रोज़ छत की दरकनों को देखता हूँ ख़ौफ़ से, अब भरोसा भी नहीं बाकी किसी शहतीर में।"शिव प्रसाद जमदग्निपुरी ने सामाजिक चेतना से ओतप्रोत रचनाएँ प्रस्तुत करते हुए कहा— "दबी हुई आग को भड़काइए मत" तथा "यही पिलाते हैं दूध विषधर को दिन-रात।"अरुण दुबे ने मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते हुए गीत प्रस्तुत किया— "जाने कैसे बने दरिंदे आज के इंसानों में।" डॉ. ओमप्रकाश तिवारी ने अपनी मार्मिक रचनाओं "धूम्र, तुम कितने प्रिय थे इस धरती पर" तथा "मैया, अब आसन कहाँ लगाऊँ" का पाठ किया।डॉ. प्रमोद पल्लवित ने "पाप-पुण्य का लेखा-जोखा", "देख रहा हूँ एकटक उसकी ओर" तथा "मेरी तक़दीर में तुम रहो न रहो, मेरे जज़्बात…" जैसी रचनाओं से श्रोताओं को भाव-विभोर किया।
विमलेश झा ने समसामयिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि "लोभ-लालच बढ़ रहा इंसान में" तथा "कहीं न जान ले ले अधम यह आपकी चुप्पी।" उपेन्द्र पाण्डेय ने आध्यात्मिक भावभूमि पर आधारित रचनाओं का पाठ किया "जहाँ में कोई आता है, जहाँ से कोई जाता है" तथा "यह सृष्टि रुक नहीं सकती, प्रभु इसको चलाता है।" अजीत सिंह ने मानवीय मूल्यों के ह्रास पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा "मानव पतित आज बन गया, न इसमें मानवता है।"डॉ. अशोक पाण्डेय ने अपनी प्रेरणादायी रचनाओं "हम पत्थर पर फूल खिलाते हैं" तथा "लोरी के गीत सुनाती थी" का पाठ कर खूब सराहना प्राप्त की। माता कृपाल उपाध्याय ने समसामयिक राजनीतिक परिवेश पर व्यंग्य करते हुए अपनी रचना "ग्राम पंचायत का चुनाव, तनाव सारे यूपी में" सुनाई। गोष्ठी का शुभारंभ उपेन्द्र पाण्डेय द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। अंत में उन्होंने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। गोष्ठी का समापन सौहार्दपूर्ण एवं साहित्यिक वातावरण में हुआ।
