Gondia News : राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति- 2026 एवं राष्ट्रीय फार्मेसी आयोग विधेयक- 2026 मसौदा जारी



27 व 31 जुलाई 2026 तक सुझाव आमंत्रित

विकसित भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जाने वाला दूरदर्शी कदम समग्र व्यापक विश्लेषण

गोंदिया - वैश्विक स्तरपर भारत आज विकसित भारत- 2047 के अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है,जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ- साथ एक सुदृढ़,आधुनिक, वैज्ञानिक तथा जन-केंद्रित स्वास्थ्य व्यवस्था का निर्माण भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया है  भारत आज केवल विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला लोकतांत्रिक राष्ट्र ही नहीं, बल्कि तेजी से उभरती हुई स्वास्थ्य महाशक्ति बनने की दिशा में भी निरंतर आगे बढ़ रहा है।किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद से नहीं मापी जाती, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य,अनुसंधान क्षमता, चिकित्सा नवाचार तथा गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से भी आंकी जाती है। यही कारण है कि भारत सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय निरंतर ऐसी नीतियाँ और कानून विकसित कर रहा है जो देश की स्वास्थ्य प्रणाली को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप सशक्त बना सकें।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते इस आर्टिकल के माध्यम से आम जनता को यह जानकारी देना चाहूंगा कि अभी हाल ही में 8 जुलाई 2026 को जारी की गई डब्ल्यूएचओ- आईएआर सी ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट ऑन कैंसर 2026 क़ी कैंसर सुनामी 2050 की चेतावनी से दुनियाँ  चिंतित हो गई है? इसके पहले हमने देखे क़ि कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनियाँ को यह स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी देश की वास्तविक ताकत केवल उसकी सैन्य या आर्थिक क्षमता नहीं होती, बल्कि उसकी स्वास्थ्य व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता और दवा प्रणाली की मजबूती भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।महामारी के दौरान भारत ने टीकों के अनुसंधान,उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति में जो भूमिका निभाई, उसने दुनिया का ध्यान भारतीय वैज्ञानिक क्षमता की ओर आकर्षित किया।इसी अनुभव के आधार पर अब भारत सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रही है।इसी दिशा में राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति-2026 तथा राष्ट्रीय फार्मेसी आयोग विधेयक-2026 के मसौदे सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किए गए हैं।इन पर क्रमशः 27 जुलाई 2026 तथा 31 जुलाई 2026 तक नागरिकों वैज्ञानिकों, चिकित्सा विशेषज्ञों, फार्मासिस्टों, शिक्षाविदों,उद्योग जगत तथा अन्य हितधारकों से सुझाव आमंत्रित किए गए हैं। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि सरकार नीति निर्माण को केवल सरकारी प्रक्रिया न मानकर जनभागीदारी पर आधारित लोकतांत्रिक प्रक्रिया बनाना चाहती है। 
साथियों,आज पूरी दुनियाँ स्वास्थ्य क्षेत्र में चौथी औद्योगिक क्रांति का अनुभव कर रही है।आर्टिफिशल इंटेलीजेंस,मशीन लर्निंग,जीन एडिटिंग,बिग डेटा, रोबोटिक सर्जरी, टेलीमेडिसिन और डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड जैसी तकनीकें चिकित्सा व्यवस्था का स्वरूप बदल रही हैं। ऐसे समय में भारत यदि अपनी अनुसंधान नीति और फार्मेसी शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक नहीं बनाता, तो भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकता है।राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति-2026 का मूल उद्देश्य भारत में स्वास्थ्य अनुसंधान को नई दिशा देना है। कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दिया कि जिन देशों की वैज्ञानिक अनुसंधान क्षमता मजबूत होती है, वे महामारी, नई बीमारियों और स्वास्थ्य आपदाओं का सामना अधिक प्रभावी ढंग से कर सकते हैं। भारत ने भी कोरोना काल में वैक्सीन निर्माण, दवा उत्पादन तथा डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की, किंतु इस अनुभव ने यह भी बताया कि अनुसंधान के लिए दीर्घकालिक निवेश, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, प्रशिक्षित वैज्ञानिक, गुणवत्ता पूर्ण डेटा तथा उद्योग एवं शैक्षणिक संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक है।नई नीति इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनुसंधान को अधिक समन्वित, पारदर्शी,नैतिक तथा नवाचार- आधारित बनाने का प्रयास करती है। 
साथियों, यह नीति केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य अनुसंधान को सीधे जनस्वास्थ्य से जोड़ना है।कैंसर,मधुमेह,हृदय रोग, मानसिक स्वास्थ्य, क्षय रोग, दुर्लभ बीमारियाँ,एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस,मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा वृद्धजन स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव है। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता जीनोमिक्स बायोटेक्नोलॉजी, डिजिटल हेल्थ, बिग डेटा तथा प्रिसिजन मेडिसिन जैसे आधुनिक क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा देकर भारत को वैश्विक स्वास्थ्य नवाचार केंद्र बनाने का लक्ष्य भी इस नीति में दिखाई देता है। अनुसंधान में नैतिक मानकों का पालन, डेटा सुरक्षा, रोगियों के अधिकारों की रक्षा तथा वैज्ञानिक पारदर्शिता को भी नीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय फार्मेसी आयोग विधेयक-2026 भारत की फार्मेसी शिक्षा एवं पेशेवर नियमन में व्यापक सुधार का प्रयास है। आज भारत विश्व की फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड के रूप में प्रसिद्ध है। देश विश्व के अनेक देशों को सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएँ उपलब्ध कराता है। भारतीय औषधि उद्योग वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है, किंतु फार्मेसी शिक्षा, प्रशिक्षण, पंजीकरण व्यवस्था, व्यावसायिक नैतिकता तथा आधुनिक कौशल विकास में समय के साथ सुधार की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही थी। प्रस्तावित विधेयक इन्हीं कमियों को दूर करने का प्रयास करता है ताकि भारत में फार्मेसी शिक्षा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो सके। 
साथियों,विधेयक का उद्देश्य केवल एक नया आयोग बनाना नहीं है,बल्कि पूरे नियामक ढाँचे का आधुनिकीकरण करना है। इसमें फार्मेसी शिक्षा कीगुणवत्ता बढ़ाने, आधुनिक पाठ्यक्रम लागू करने, डिजिटल पंजीकरण प्रणाली विकसित करने, राज्यों और केंद्र के बीच बेहतरसमन्वय स्थापित करने, फार्मासिस्टों के लिए सतत व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने तथा मरीज- केंद्रित फार्मेसी सेवाओं को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं। यदि ये सुधार प्रभावी रूप से लागू होते हैं तो देश में दवा वितरण व्यवस्था और अधिक पारदर्शी, वैज्ञानिक तथा सटिका से जवाबदेह बन सकती है। 
साथियों, इन दोनों मसौदों का सबसे बड़ा लाभ आम नागरिकों को मिलेगा। मजबूत स्वास्थ्य अनुसंधान प्रणाली के कारण नई दवाओं, वैक्सीनों और उपचार पद्धतियों का विकास तेज होगा। रोगों की शीघ्र पहचान संभव होगी, उपचार अधिक प्रभावी होगा तथा स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार आएगा। फार्मेसी शिक्षा में सुधार से अधिक प्रशिक्षित और उत्तरदायी फार्मासिस्ट तैयार होंगे, जिससे दवाओं के सुरक्षित उपयोग, रोगियों को उचित परामर्श तथा नकली एवं निम्न गुणवत्ता वाली दवाओं पर नियंत्रण में मदद मिलेगी। डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचाने में भी सटीकता से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 
साथियों, वैश्विक स्तर पर भी इन सुधारों का महत्व अत्यंतव्यापक है।वर्तमान समय में विश्वस्वास्थ्य अनुसंधान, जैव-प्रौद्योगिकी, डिजिटल हेल्थ, मेडिकल डिवाइस, वैक्सीन विकास तथा प्रिसिजन मेडिसिन के क्षेत्र में तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका,ब्रिटेन, जर्मनी, जापान,दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों ने अनुसंधान एवं नवाचार को राष्ट्रीय विकास का आधार बनाया है। यदि भारत भी इन दोनों सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू करता है तो वह वैश्विक क्लीनिकल रिसर्च, फार्मास्यूटिकल निर्माण,जैव- प्रौद्योगिकी तथा स्वास्थ्य नवाचार का प्रमुख केंद्र बन सकता है। इससे विदेशी निवेश, रोजगार, निर्यात तथा वैज्ञानिक सहयोग के नए अवसर भी उत्पन्न होंगे। 
साथियों, हालाँकि, इन सुधारों की सफलता केवल कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए अनुसंधान पर पर्याप्त सार्वजनिक एवं निजी निवेश बढ़ाना होगा, ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसंधान सुविधाएँ विकसित करनी होंगी, मेडिकल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में आधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित करनी होंगी तथा युवा वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को प्रोत्साहन देना होगा। साथ ही डेटा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, अनुसंधान नैतिकता, बौद्धिक संपदा अधिकार तथा रोगियों की गोपनीयता जैसे विषयों पर भी स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी होगी। फार्मेसी शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण, उद्योग- अकादमिक सहयोग तथा आधुनिक तकनीकों का सटीकता से समावेश भी आवश्यक होगा। 
साथियों, एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में सार्वजनिक सुझाव आमंत्रित करना केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है,बल्कि नीति निर्माण को अधिक प्रभावी और व्यावहारिक बनाने का माध्यम है चिकित्सक,वैज्ञानिक,फार्मासिस्ट,शिक्षण संस्थान, अस्पताल, उद्योग संगठन, सामाजिक संस्थाएँ तथा आम नागरिक अपने अनुभवों के आधार पर ऐसे सुझाव दे सकते हैं जो भविष्य में इन नीतियों और कानूनों को अधिक उपयोगी बना सकें। यह जनभागीदारी ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।यदि सुझावों के आधार पर अंतिम नीति और विधेयक को व्यापक,व्यवहारिक तथा भविष्य उन्मुख स्वरूप दिया जाता है तो भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था नई ऊँचाइयों तक पहुँच सकती है।इससे देश में अनुसंधान संस्कृति मजबूत होगी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा, चिकित्सा शिक्षा और फार्मेसी शिक्षा विश्वस्तरीय बनेगी तथा भारत वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व की दिशा में और अधिक सशक्त होकर आगे बढ़ेगा। 
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति-  2026 तथा राष्ट्रीय फार्मेसी आयोग विधेयक-2026 केवल दो मसौदा दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि विकसित भारत की भावी स्वास्थ्य व्यवस्था की आधारशिला हैं। यदि सरकार इन पर प्राप्त सुझावों का गंभीरतापूर्वक परीक्षण कर उन्हें अंतिम स्वरूप में समुचित स्थान देती है और उनके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करती है, तो भारत न केवल अपने नागरिकों को सुरक्षित, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध करा सकेगा, बल्कि स्वास्थ्य अनुसंधान, दवा निर्माण, चिकित्सा शिक्षा और वैज्ञानिक नवाचार के क्षेत्र में विश्व का अग्रणी राष्ट्र बनने की दिशा में भी ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त करेगा। यही विकसित भारत-2047 की वास्तविक भावना है, जहाँ विज्ञान, अनुसंधान, गुणवत्ता, पारदर्शिता और जनभागीदारी मिलकर स्वस्थ, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करेंगी।

*-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*

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