Jaunpur News : जौनपुर रियासत के 11वें नरेश राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे की पुण्यतिथि पर विशेष


जौनपुर। जौनपुर की राजनीतिक और सामाजिक विरासत में राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है। भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे राजा साहब अपने ओजस्वी व्यक्तित्व, प्रभावशाली वक्तृत्व और जनसंपर्क के लिए पूरे देश में चर्चित रहे। उनकी पुण्यतिथि पर राज पीजी कॉलेज जौनपुर के पूर्व प्राचार्य प्रोफेसर (कैप्टन) डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला ने उनके जीवन और राजनीतिक योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे का जन्म 7 दिसंबर 1918 को राजमहल में हुआ था। मात्र 27 वर्ष की आयु में पिता राजा श्री कृष्ण दत्त जी महाराज के देहावसान के बाद वैदिक विधि-विधान से उनका राज्याभिषेक हुआ। राजपरिवार की परंपराओं और संस्कारों में पले-बढ़े राजा साहब प्रारंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और बाद में सक्रिय राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव वर्ष 1952 में उन्होंने स्टार प्रचारक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने व्यवहार, व्यक्तित्व और ओजस्वी भाषणों से उन्होंने लोगों के बीच गहरी पहचान बनाई। वर्ष 1957 के विधानसभा चुनाव में उन्हें जौनपुर सदर से प्रत्याशी बनाया गया, जहां विजय हासिल करने के बाद उन्होंने अपना अधिकांश समय जनता के बीच बिताया।

वर्ष 1962 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जौनपुर सदर से कांग्रेस के लोकप्रिय नेता और तत्कालीन गृह मंत्री हरगोविंद सिंह को पराजित किया। इसके बाद वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में रहे। वर्ष 1967 में बरसठी विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। राजनीतिक क्षेत्र में उनका प्रभाव इतना व्यापक था कि वह जिन प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारते, उन्हें जिताने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

राजा साहब की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके चुनावों की चर्चा बीबीसी लंदन तक में होती थी। एक अवसर पर बीबीसी लंदन ने टिप्पणी की थी कि राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं के सामने चुनाव लड़ने के लिए कोई कांग्रेसी प्रत्याशी तैयार नहीं है। उस समय देश की राजनीति में कांग्रेस का व्यापक प्रभाव था, इसके बावजूद राजा साहब की लोकप्रियता अलग पहचान रखती थी।

वर्ष 1977 और 1989 में वह दो बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। संसद में उनके भाषण राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रहते थे। अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर उनके एक लंबे भाषण का संस्मरण सुनाते हुए प्रोफेसर डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला बताते हैं कि जब लोकसभा अध्यक्ष ने समय समाप्त होने की बात कही, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपना समय भी राजा साहब को देने का आग्रह किया था।

इसी दौरान कांग्रेस नेता सीएम स्टीफन द्वारा भाषण के बीच टोका-टाकी किए जाने पर राजा साहब ने भोजपुरी अंदाज में कहा था—“तोहार उमर चालीस होई आई, अबहीं ना गई तोहार लरिकाई।” उनके इस जवाब के बाद पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठा था।

राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे को अपने राजनीतिक जीवन में तीन बार जेल भी जाना पड़ा। पहली बार महात्मा गांधी की हत्या के मामले में नाथूराम गोडसे द्वारा प्रयोग की गई गाड़ी और पिस्तौल को राजा साहब से जोड़ते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब 60 दिनों तक नैनी सेंट्रल जेल में कठोर कारावास में रखा गया। बाद में वह इस मामले में निर्दोष साबित हुए। इसके बाद आपातकाल और राम मंदिर शिलापूजन आंदोलन के दौरान भी उन्हें जेल यात्रा करनी पड़ी।

राजमहल उस दौर में राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों की आवाजाही से गुलजार रहता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर, भाऊराव देवरस, वेणुगोपाल, नानाजी देशमुख, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र सहित विभिन्न दलों के नेताओं का राजमहल में आना-जाना लगा रहता था।

राजा साहब स्वयं भी गांव-गांव जाकर लोगों से संपर्क करते थे। उनकी स्मरण शक्ति इतनी प्रबल थी कि एक बार मिलने वाले व्यक्ति को लंबे समय बाद भी नाम से पुकार लेते थे। वह अपनी निजी गाड़ी और राजपरिवार के झंडे का ही प्रयोग करते थे। हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत के साथ-साथ उन्हें विज्ञान और ज्योतिष का भी अच्छा ज्ञान था।

राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे ने 9 सितंबर 1999 को प्रातः 9 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद निकली अंतिम यात्रा में ऐसा जनसैलाब उमड़ा, जिसे आज भी जौनपुर के लोग याद करते हैं। राजमहल से रामघाट तक लोगों का रेला उमड़ पड़ा था। राजनीतिक नेताओं, व्यापारियों और आम नागरिकों सहित बड़ी संख्या में लोग अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

प्रोफेसर डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला के अनुसार, जिस स्थान पर राजा साहब का चंदन की लकड़ियों से अंतिम संस्कार किया गया था, वहां की अग्नि आज भी निरंतर प्रज्वलित है और उसी अग्नि से अन्य शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है।

जौनपुर की राजनीतिक और सामाजिक चेतना में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे को पुण्यतिथि पर जनपदवासियों की ओर से शत-शत नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।



ॐ शांति शांति शांति।

प्रोफेसर (कैप्टन) डॉ. अखिलेश्वर शुक्ला
पूर्व प्राचार्य, राज पीजी कॉलेज, जौनपुर
उत्तर प्रदेश
संपर्क: 9451336363
और नया पुराने

Contact us for News & Advertisement

Profile Picture

Ms. Kshama Singh

Founder / Editor

Mo. 9324074534